पाखण्डी जातिवाद

भंवर मेघवंशी


मुझे कुछ कहना है
जाति विरोधी
मगर घनघोर
जातिवादी एक्टिविस्टों से !

जातिवादी गटर के
घृणित कीड़ों
तुमसे यह भी
ना हुआ बर्दाश्त
कि कोई दलित
पहन ले
तुमसे अच्छे
कपड़े
रहे तुमसे
बड़े मकान में .

तुम साईकिलो के
मारते रहो पैडल
या घसीटते रहो
पग पैदल पैदल
और तुम्हारा ही
साथी दलित
बैठने लगे
गाड़ियों में .

भले ही तुम
सामाजिक कार्यकर्ता की
खाल ओढ़ चुके हो
पर हो जातिवादी भेड़िये
तुमसे यह कैसे
सहन हो सकता है
कि कोई दलित
डालकर
तुम्हारी आँखों में
आँखें
करने लगे
तुमसे तीखे सवाल.

तुम बातें न्याय की
मंत्र समानता के
दोहराते रहते हो
भले ही मंचो पर
लेकिन
असल जिन्दगी में
तुमने कब जिया
इन शब्दों को ?

सिखाये शब्द
दोहराना
उन्हें जीना
नहीं होता
उधार के तोतों .

जब कोई दलित
करने लगता है
तुमसे बराबरी
बढ़ जाता है
तुमसे आगे .

तब तुम्हारा
सारा लोकतंत्र
हवा हो जाता है
सारी महानता
का उतरने लगता है
अचानक आवरण.

तब जातिवाद के
विषैले सांपों
तुम्हारी केंचुली
उतरने लगती है
यकबयक.

तुम कितने भी
संगठन बना लो
या कर लो
विपश्यना के ढोंग
सतसंगों में गा लो
भजन मीठे मीठे
तुम कितनी ही
कर लो बातों से
अपनी काया को
कंचन
पर तुम्हारे भीतर
जातिवाद का कीडा
रेंगता ही रहता है
हरदम ,हरवक्त.

तुम्हारी धमनियों में
जातिवाद बहता है
रक्त बनकर
समाजसेवा के
नाम पर
अपना पेट भर रहे
निर्लज्ज निकम्मे
जातिवादी रोटेडों,
तुम सब कुछ
हो सकते हो
पर कभी भी
नहीं बन सकते
इंसान.

तुम्हारी
रग रग में
भरा है जातिवाद
जिससे आती
सड़ान्ध अब
असह्य
हो चुकी है.

इसलिये हे
सिविल सोसायटी के
स्वयम्भूं
नैतिक पवित्रों ,
हे एक्टिविस्ट
प्रजाति के
परम पाखण्डियों ,
आज से मैं
खारिज करता हूं तुमको
तुम भी कर देना
खारिज मुझको.

मैं पूरे होशो हवाश में
यह करता हूं दावा
कि तुमसे कुछ भी
नहीं बदला
ना ही कुछ बदलेगा
हरी घास के
ग्रीन स्नेंकों .

हम जो आज
वंचित है ,दलित है
पीडि़त है
हम वक्त के
सपेरे है ..
बजायेंगे बीन
ढूंढ़ लेंगे तुमको
एक न एक दिन
और कुचल देंगे
तुम्हारा फन
पूरी निर्ममता से…
जाति की गहन गुफाओं
को लगा देंगे आग
वर्ण और जाति के
बिलों में भर देंगे पानी
हवा को कर देंगे
धुंआ धुंआ .

पक्का यकीं है
हमको ,कि
हम हर कीमत पर
हरा देंगे
तुम्हारे इस
घृणित जातिवाद को.

 

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