मेरी संसद में

संजीबा


मेरी संसद में बैठे हैं –
काठ की
कुर्सियों पर
काठ के उल्लू ,
वे जब लौटेंगे दिल्ली से
तो झूठ पर
नये सपनों/ नारों
वादों का मुल्लमा चढ़ाके
हाय ! री कमबख्त सरकार
तेरे विश्वास पर
मर गया
इंतजारी में
अपनी ही देहरी पर
हाड़ का उल्लू ,
सचमुच हम कब तक
मरेंगे – जियेंगे
इस हुकूमत की इस
व्यवस्था में
अफ़सोस
मैं उनसे लड़-के क्यों नही
मरता –
उफ़ !!
मैं भी इस बात का उल्लू……..

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