यह सब एक दिन में नहीं हुआ

हयात सिंह


यह सब एक दिन में नहीं हुआ
अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त
गवाह बने और मिट गए
नाटक का पर्दा उठने और गिरने में
समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का
मगर मंचन घंटों चलता है
मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक
कई बार बरसों लग जाते हैं
एक आम दर्शक पर्दा उठने और गिरने के सिवा
कहाँ कुछ सहेज पाता है स्मृति में
बस, आम की इसी कमजोरी का फ़ायदा
उठाता है, निर्देशक
समय के सापेक्ष
कभी साप्ताहिक, कभी मासिक अंतराल में
जरुरत पड़ने पर शहर और पात्र बदलकर
एक ही नाटक के मंचन से
अर्जित कर लेता है कहीं अधिक
हर एक दशक के बाद बदल जाता है
नाटक लिखने वाला
मंचन करने वाला
पर्दा उठाने वाला, गिराने वाला
यहाँ तक कि बदल जाता है निर्देशक
मगर, निर्देशन युगों-युगों से
जैसे का तैसा ही, चलता आ रहा है
प्रकृति प्रद्दत सभी रंग और ध्वनियों से अनभिज्ञ
आम, एक बार पुनः ठगा जाता है
कला के बहाने
संगीत के बहाने
इसीलिए, इस सबके पूर्णरूपेण
समाप्त होने की आशा और उम्मीद,बहुत
बड़ी बेईमानी है
जीवन की एक अदद जरुरत है मनोरंजन
हाँ, मनोरंजन में कटौती की जा सकती है
कब, कैसे और कितने का निर्धारण
स्वयं करना होगा
और स्वयं निर्धारण करने योग्य विवेक के लिए
जरुरी है एक और नाटक
एक और मंचन
एक और शहर
एक और नायक
एक और नायिका
एक और खलनायक
एक और पर्दा
इन सब में एक से अधिक अगर कुछ चाहिए, तो
वह है आम दर्शक
जिसकी हाल-फिलहाल कोई कमी नहीं
यह बात निर्देशक के अलावा
नाटक के पात्रों को भी पड़ गयी है मालूम
इसीलिए, सबके सब निर्देशक बनकर
नए-नए पात्रों के साथ
नए-नए तरीके से नए-नए नाटक रच रहे हैं
भीड़ कभी इधर, कभी उधर

इस भीड़ को आदत पड़ गयी है नाटकों की
हाँ, किरदार निभाने वाला
हर बार नए होना चाहिए
नया किरदार एक दिन में नहीं पैदा हो जाता
बल्कि इसके लिए
सैकड़ों- हजारों साँझ
अपना यौवन लुटा समय से पहले रात बन जाती हैं।

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