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जीएसटी में तंबाकू पर 26 प्रतिशत की प्रस्तावित सिन रेट राजस्व और जन स्वास्थ्य पर डालेगी नकारात्मक असर : 40 प्रतिशत से कम की सिन रेट से तंबाकू उपयोगकर्ताअेां की संख्या में होगी बढ़ोतरी

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मुंबई, 1 नवंबर।

विश्व भर में तंबाकू उपभोक्ताओं की संख्या के मामले भारत दूसरे स्थान (27.5 करोड या भारत के 35 प्रतिशत व्यस्क) पर है। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हर साल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर जाते हैं। जिसमें 72 हजार नागरिक राजस्थान के भी शामिल है। तंबाकू सेवन के कारण देश को स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक आर्थिक खर्च वहन करना पडता है। हाल ही में दिल्ली में हुई जीएसटी की बैठक में 26 प्रतिशत की सिन रेट (तंबाकू इत्यादि उत्पादों पर लगने वाला कर)  का प्रस्ताव दिया गया है, जबकि राजस्थान में सभी तंबाकू उत्पादों पर 65 प्रतिशत टैक्स है।

इस बात पर निश्चित तौर पर एक अहम आम सहमति है कि तंबाकू जैसी जो चीजें समाज के लिए हानिकारक हैं और “सिन” के रूप में वर्गीकृत की गई हैं, उनपर जीएसटी के तहत उच्च दर पर कर लगाया जाना चाहिए। प्रमुख आर्थिक सलाहकार रिपोर्ट में ऐसी सिफारिश की गई है। उसमें सिगरेट, बीडी और चबाने वाले तंबाकू समेत सभी तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत जीएसटी सिन रेट लगाने की बात कही गई है।

20 अक्तूबर को संपन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में इससे कहीं कम यानी 26 प्रतिशत की सिन रेट का प्रस्ताव दिया गया है, जिसका देश के राजस्व के साथसाथ उसके जन स्वास्थ्य पर भी बड़ा असर पडेगा। इन दोनों पर ही गंभीरता से गौर किया जाना जरूरी है। सिन टैक्स के पीछे के दो तार्किक कारण हैं। पहला तार्किक कारण तंबाकू जैसे उत्पादों के कारण समाज को होने वाले नुकसान के लिए भरपाई है और दूसरा कारण इन उत्पादों की कीमत बढाना और इनका इस्तेमाल घटाना है। 26 प्रतिशत की दर इन दोनों ही उद्देश्यों को विफल कर देगी। यह तंबाकू से मिलने वाले मौजूदा राजस्व को कम कर देगी और असल में तंबाकू उत्पादों को खास तौर पर बच्चों एवं युवाओं समेत कमजोर वर्ग के लोगों को आदतन बना देगी, जिससे इन उत्पादों के सेवन को बढावा मिलेगा।

आईआईटी जोधपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ.रीजो जॉन के अनुसार, “यदि सरकार जीएसटी के बाद तंबाकू उत्पादों पर मौजूदा आबकारी शुल्क को बनाए भीरखती है तो भी 40 प्रतिशत की जीएसटी सिन रेट की तुलना में 26 प्रतिशत की सिन रेट लगाना तंबाकू कर के कुल राजस्व को लगभग पांचवें हिस्से (17प्रतिशत या मोटे तौर पर 10,510 करोड रूपए) तक घटा देगा। स्पष्ट तौर पर, 26 प्रतिशत की सिन रेट तंबाकू के लिए राजस्व निरपेक्ष स्थिति बनाए रखने केलिए जरूरी दर से कहीं कम होगी। चूंकि अधिकतर तंबाकू उत्पादों पर औसत वैट की दरें खुद ही 26 प्रतिशत से ज्यादा हैं, ऐसे में 26 प्रतिशत की सिन रेट सभी तंबाकू उत्पादों पर कर का बोझ महत्वपूर्ण तरीके से कम कर देंगी।” उन्होने बताया कि तंबाकू का सेवन देश पर भारी स्वास्थ्य एवं आर्थिक खर्च डालता है। तंबाकू के सेवन के कारण होने वाली बीमारियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्च वर्ष 2011 में 1.04 लाख करोड रूपए या भारत की जीडीपी का 1.16 प्रतिशत था।

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्रोफेसर और कैंसर सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी के अनुसार, “जीएसटी की कहीं कम दर सभी तंबाकू उत्पादों को युवाओं और अन्य कमजोर तबकों के लोगों के लिए कहीं ज्यादा आदतन बना देगी। इसके परिणामस्वरूप तंबाकू का प्रकोप और ज्यादा बढ जाएगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बहुत बढ जाएगा और उत्पादकता में गिरावट आएगी। इससे निश्चित तौर पर प्रति वर्ष कैंसर से मरने वालों की संख्या बढेगी, जो किसी भी देश के लिए अच्छी खबर नहीं है। डा.चतुर्वेदी ने अपील है कि सरकार को तंबाकू उत्पादों पर उच्च् दर पर कर लगाना चाहिए ताकि लोगों को इसके सेवन के लिए हतोत्साहित किया जा सके।”

लगभग 48 प्रतिशत पुरूष और 20 प्रतिशत महिलाएं (व्यस्क जनसंख्या का 35 प्रतिशत) तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हरसाल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर रहे हैं। तंबाकू के बाजार में 48 प्रतिशत हिस्सेदारी बीडी की, 38 प्रतिशत चबाने वाले तंबाकू की और 14 प्रतिशत हिस्सेदारी सिगरेट की है। इसलिए यह बात स्पष्ट है कि इन मौतों के लिए बीड़ीं बडी जिम्मेदार हैं।

“मौजूदा तंबाकू कर तंबाकू उत्पादों की विभिन्न किस्मों (जैसे बीड़ीें, धुंआरहित तंबाकू और सिगरेटों) के बीच भेद करता है। नई जीएसटी प्रणाली में भी कमजोर लोगों को एक तरह से कर मुक्त बीड़ी बेचना जारी रखने से यह सुनिश्चित होगा कि गरीब लोग गरीबी और खराब स्वास्थ्य के दुष्चक्र में फंसे रहें। इसकी नियमित लत के कारण वह तंबाकू पर ज्यादा खर्च करने के लिए प्रेरित होते हैं और भोजन, स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा पर कम खर्च करते हैं। हम केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करतें है कि बीडी समेत तंबाकू की सभी किस्मों पर जीएसटी प्रणाली के तहत 40 प्रतिशत का कर लगाया जाए ताकि लोगों को इसके बुरे प्रभाव से बचाया जा सके।”

“धुंए वाले 85 प्रतिशत तंबाकू का सेवन बीड़ी के रूप में किया जाता है, तंबाकू संबंधी 10 लाख मौतों का एक बडा प्रतिशत(5.8 लाख लोग) बीडी के सेवन के कारण है। इसलिए अधिकतम कर लगाने के लिए सिन प्रोडक्ट्स की उच्चतम श्रेणी में बीड़ी को रखकर न सिर्फ लाखों गरीब भारतीयों की जिंदगी ही बचाई जा सकती है बल्कि यह समाज के विभिन्न तबकों के बीच स्वास्थ्य के भारी अंतर को भी कम करने में मदद मिल सकती है। सरकार को इन मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर देखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तंबाकू की विभिन्न किस्मों के बीच कोई अंतर न किया जाए और उन पर उच्चतम संभावित दरों का कर लगाया जाए ताकि हमारे सबसे कमजोर तबकों के लोगों को इसका शिकार बनने से बचाया जा सके।”

करीब 27.5 करोड़ भारतीय तंबाकू का सेवन करते हैं और इनमें एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें बचपन में ही इसकी लत लग जाती है। ग्लोबल एडल्टटोबेको के सर्वे के अनुसार तंबाकू शुरु करने की उम्र 17 साल है वहीं किशोरियों में यह आयु महज 13 साल है। ग्लोबल यूथ टोबेको के सर्वे में सामने आया किभारत के 20 प्रतिशत बच्चे तंबाकू के उत्पादों का प्रयोग करते हैं। 5500 बच्चे, किशोर प्रति दिन तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। राज्य में हर रोज औसतन350 नए बच्चे तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। प्रदेश में तंबाकू की लत 32 प्रतिशत लोगों में है तथा राजस्थान में करीब 72 हजार लोग इसी कारण दम तोड़ देते है।

मुख के कैंसर के कारण मौत का ग्रास बने महाराष्ट्र के पूर्व गृह एवं श्रम मंत्री सतीश पेडनेकर की पत्नी श्रीमति सुमित्रा पेडनेकर ने कहा, मैंने तंबाकू के कारण अपने पति को एक छोटी उम्र में खो दिया। मैं उनकी एक गलत निजी पसंद के कारण कष्ट उठा रही हूं। मुझे और मेरी दो बेटियों को न सिर्फ भावनात्मक कष्ट उठाना पडा बल्कि हम आर्थिक तौर पर भी टूट गए थे। कोई भी विधवा और अनाथ बनाने वाले इस कारखाने को सब्सिडी देने की सोच भी कैसे सकता है? सरकार ऐसे उद्योग को सहायता देती नहीं दिखाई देनी चाहिए कि , जो भारी मुनाफा जुटाने के लिए हर साल 10 लाख परिवारों को तबाह कर देता है।”

मौजूदा परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान आबकारी कर के साथ 40 प्रतिशत की सिन रेट और तंबाकू उत्पादों पर कर लगाने के राज्य के अधिकार जनस्वास्थ्य एवं राजस्व के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति हैं। इससे हमें न सिर्फ तंबाकू पर मौजूदा कर के बोझ के प्रबंधन में मदद मिलेगी बल्कि यह और अधिक भारतीयों को जिंदगी पर खतरा पैदा करने वाली बीमारियों का शिकार बनने एवं गरीबी के अनवरत चक्र में फंसने से भी बचाएगा।


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