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भारत के IAS अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि ब्रिटिश किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझे

त्रिभुवन


गंगासिंह के गंगनहर लाने का मिथक

गंग नहर

गंग नहर

महाराजा गंगासिंह गंगनहर निकालकर आए और भगीरथ की तरह साबित हुए। यह मिथक जाने कब से चल रहा है। जिसकी सत्ता होती है, इतिहासकार भी उसके दास होते हैं। आप बस एक बार एक मिथक बस साबित कर दीजिए, फिर बाकी काम हम पत्रकार मुफ़्त में करते रहेंगे। ये मिथक फिर चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक कितने ही क्यों न हों। हर युग की अपनी रामायण और हर युग के अपने राम होते हैं। हर सम्राट, हर बादशाह और लोकतांत्रिक शासक तक अपने आपको गौरवान्वित करने की आत्मप्रशंसा से बाज नहीं आते। उन्हें स्वयं एहसास नहीं होता तो हर राम को उनका तुलसीदास तलाश कर ही लेता है।

गंगनहर और गंगानगर के इतिहास को लेकर मैं बीकानेर के अभिलेखागार से लेकर दिल्ली में तीन मूर्ति भवन के नेहरू मेमोरियल संग्रहालय तक की बहुत ख़ाक छान चुका हूं। इस पर मेरी एक किताब भी कंप्यूटर के किसी कोने में पड़ी है। तथ्य ये है कि 1876 से 1878 के बीच भयावना अकाल पूरे हिंदुस्तान में पड़ा था। यह ग्रेट फेमीन के नाम से इतिहास में कुख्यात है। इंपीरियल गजट ऑव इंडिया के थर्ड वॉल्यूम (1907 में प्रकाशित) के अनुसार इस अकाल ने देश के छह लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने बाहुपाश में ले लिया था। इसमें पांच करोड़ 85 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए थे और 55 लाख लोग भूखों मर गए थे। पंजाब और नॉर्थ प्रोविंस में आठ लाख और राजपूताने में कोई 20 लाख काल कवलित हुए। किसी को अनाज का दाना नहीं मिला और किसी को पानी की बूंद। मारे भूख के लोग मरे हुए जानवरों तक को खा गए या कीकर-जांटी के पेड़ों की छाल चबा-चबाकर मर गए।

 

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लार्ड नार्थब्रुक

लार्ड नार्थब्रुक

इस अकाल ने दक्षिण भारत के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। इस अकाल ने ब्रिटिश सरकार के संवेदनहीन लोगों तक को बुरी तरह हिला दिया था। उन दिनों लॉर्ड नार्थब्रुक वायसरॉय थे। लेकिन वे 1876 में चले गए थे। लेकिन इस अकाल का सामना किया लार्ड लिटन ने, जो 1876 से 1880 तक वायसरॉय रहे। लॉर्ड नार्थ ब्रुक और लॉर्ड लिटन की डायरियाें में दर्ज टिप्पणियां रोंगटे खड़े कर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि भारतीय राजे-महाराजे, जिन्हें हमने आज लोकतांत्रिक कालखंड में सिर के ऊपर बिठा रखा है, कितना गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे थे। इन देशी शासकों और उनके सलाहकारों ने इस तांडव को भाग्य से जोड़कर अपने फर्ज़ से किस तरह मुंह मोड़ लिया था। आप भरोसा नहीं करेंगे, अगर उस समय जातिभेद से ऊपर उठकर काम करने वाला अंगरेज़ अमला नहीं होता तो दलितों और कथित अछूतों की जो हालत होती, वह अकल्पनीय थी। और बहुत हद तक रही भी।

लार्ड रोबर्ट लिटन

लार्ड रोबर्ट लिटन

ख़ैर, उन्हीं दिनों लॉर्ड लिटन के बाद जब मार्केस ऑव रिपन वायसरॉय बनकर आए तो उन्होंने अकाल से निबटने की बड़ी योजना बनाई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे विदेशी, भारत विरोधी और क्रूरशासक थे। उन दिनों उत्तर भारत के राजपूताना और बहावलनगर रियासतों में भुखमरी बहुत बढ़ गई थी। यहां के लाेगों ने पंजाब और नॉर्थवेस्ट प्रोविंस में चोरियां, डाके और बलात्कार शुरू कर दिए थे। आखिर बूभुक्षितों किं न करोति पापम् वाली स्थिति हो गई। यानी कि भूख से लड़ता आदमी कौन सा अपराध नहीं करता है! ऐसे हालात में जब पंजाब और ये प्रोविंस त्राहिमाम़् कर बैठे तो रिपन ने एक बड़ा सर्वे करवाया कि आखिर इस लॉ लेसनेस की स्थिति का कारण क्या है? वे किसी विदेशी सरकार या अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गए। इस सर्वे को बहुत बुद्धमत्ता से सोशियो-इकोनॉमिक सोच वाले लोगों ने बड़े शानदार तरीके से किया और निष्कर्ष निकला कि अगर बहावलनगर और बीकानेर रियासतों में लोगों की बहबूदी की कोई परियोजना बने तो ये लोग बस जाएं और अपराध घटें।

लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन

लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन

राजनीतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने मुकम्मल येाजना बनाकर कहा कि अगर सतलुज का पानी इन दोनों इलाकों में पहुंचा दिया जाए तो लोग खेती करेंगे और लोग खुशहाल हो जाएंगे। अर्ल ऑव डफरिन ने कोशिश की, लेकिन डूंगरसिंह नहीं मानें। वे बीकानेर के महाराजा था। मार्क्वेस ऑव लैंड्स डाउने ने भी कोशिश की, लेकिन उनके समय में एक बड़ी उम्मीद थी। उन दिनों बीकानेर कोई स्वतंत्र रियासत नहीं थी, जैसे उदयपुर, जोधपुर या जयपुर हुअा करती थी। बीकानेर में भले शासक डूंगरसिंह या गंगासिंह रहे, लेकिन वहां ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल का काम करती थी। यही मूल शासक थी। नाम मात्र को डूंगरसिंह और गंगासिंह थे। यह काउंसिल भारत सरकार तय करती थी। यानी बीकानेर सीधे तौर पर ब्रिटिश डाेमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल से गवर्न होता था। बहरहाल, इसी काउंसिल ने डूंगरसिंह के समय ही गंगासिंह को मेयो कॉलेज में पढ़ाने, ऑक्सफॉर्ड भेजने और उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना तय किया था। ये राजपरिवार के नहीं, ब्रिटिश काउंसिल के फैसले थे। और इसके बाद अंगरेज़ों का पढ़ाया गंगासिंह जब शासक बना तो वह अंगरेज़ के फैसले हूबहू लेने लगा। जैसे आर्यसमाज के सुधारकों को बीकानेर से देशनिकाला देना। जैसे आज़ादी की मांग करने वालों को बाहर निकालना और स्कूल तक नहीं खुलने देना।

महाराज गंगा सिंह

महाराज गंगा सिंह

लेकिन चूंकि अंगरेजों को अपने प्रोविंस में अपराध कम करने थे, इसलिए उन्होंने बजरिए गंगासिंह बीकानेर नहर का प्रोजेक्ट बनवाया और पूरा करवाया। यह लॉर्ड चेम्सफॉर्ड के समय यानी 1916 से 1921 के बीच बना। आपको यह भी याद दिलाता चलूं कि एक भयावना अकाल 1918-1919 के बीच भी पड़ा था। इस दौरान लॉर्ड चेम्सफॉर्ड वायसरॉय थे। इस काल ने भी उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जो विकराल कहर बरपाया, वह अवर्णनीय है। इसके नतीजे भी घोर मानवहंता रहे। इस तरह बार-बार अकाल पड़ना और बार-बार अंगरेज़ों के सीधे शासन वाले उत्तर भारतीय पंजाब और साथ लगते प्रोविंसेज में जब अपराध बेकाबू हुए तो अंगरेज़ प्रशासन की यह धारणा सुदृढ़ हुई कि अगर इन अपराधों को नियंत्रित करना है तो उन इलाकों में नए रोज़गार पैदा करने होंगे, जहां से ये आपराधिक मानसिकता पैदा हो रही है। ऐसे लोगों को रोज़गार से जोड़ना होगा, जिनकी मानसिकता इस ओर चुंबकीय ढंग से आकर्षित हो रही है। इस सोच से सतलुज का पानी बीकानेर रियासत में भेजने का फैसला हुआ। यह सिर्फ़ बीकानेर नहीं, बहावलनगर और फ़ीरोज़पुर के लिए भी हुआ। इन तीनों के लिए नहरें निकाली गईं।

आपको हैरानी होगी, 1923 में बीकानेर नहर, जिसे हम आजकल गंगकैनाल कहते हैं, वह 1925 में बनकर तैयार हो गई। दो साल में। यह काम अंगरेज़ों ने किया। भारतीय मज़दूरों का पसीना इस नहर में आज भी बहता है। गंगनहर के पानी में उन लाखों मजदूरों के उस पसीने की महक आज भी आती है। बीकानेर रियासत की प्रशासनिक और इंजीनियरिंग क्षमता जवाब दे गई तो पंजाब से अंगरेज़ सरकार ने जीडी रुडकिन और एक कमिश्नर, जिनका नाम फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा है, दो लोगों काे भेजा। इन दोनों ने गंगनहर के निकलने के साथ-साथ कालोनाइजेशन का काम शुरू किया और 1ए, दो ए, एक बीबी, चार बीबी, एक केके, दो केके, 25 एमएल, 24 एमएल, 8 टीके, पांच केके, 36 एलएनपी आदि आदि जैसे चकों के नाम हाउटलेट्स के, जिन्हें हम मोघा कहते हैं, हिसाब से निकाले। मेरा अपना गांव चक 25 एमएल है। मुख्य गंगनगर पर बने सुलेमान की हैड की शोभा और सम्मोहन आज भी कम नहीं होता है। सुलेमान की हैड का 1925 में बना पुल अभी कुछ साल तक जस का तस था। अब शायद वहां नया पुल बन गया है। लेकिन राखी और चूने के उस कमाल के सामने आधुनिक इंजीनियरिंग मारे शर्म के अपना चेहरा तो छुपा ही लेती होगी।

लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग

लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग

लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन

लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन

महाराजा गंगासिंह से ज्यादा तो अर्ल ऑव रीडिंग और लार्ड इरविन ने किया। इन दोनों वायसरॉय ने 1921 से 1926 और 1926 से 1931 के बीच गंगनहर के लिए जो किया, वह रिकॉर्ड पर है। लार्ड इरविन तो 26 अक्टूबर 1927 के दिन फीरोज़पुर हैड पर बीकानेर नहर में पानी प्रवाहित करने के उद्घाटन के मौके पर माैजूद थे।द्ध गंगासिुह के साथ-साथ इस मौके पर मदन मोहन मालवीय जी को भी विशेष तौर पर बुलवाया गया था। आपको इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि गंगानगर का स्थापना दिवस 26 अक्टूबर नहीं है। यह तो पानी प्रवाहित करने का दिन है। इसे स्थापना दिवस का नाम एक स्वच्छेचारी कलेक्टर करणीसिंह ने कुछ साल पहले दिलाने की कोशिश की थी। इन करणीसिंह को गंगानगर के सरदार सुच्चासिंह ने चूरू से लाकर बड़ी कोशिशों से खुद पढाया लिखाया और कलेक्टर के आेहदे तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन यह बंदा जब कलेक्टर बनकर आया तो इन्होंने गंगानगर के लोगों को बहुत निराशा किया। जनप्रतिनिधियों को सम्मान देना तो दूर, इनमें किसी प्रतिष्ठित नागरिक से पेश आने की शालीनता के मानदंडों को भी ताक पर रख दिया था।

इन नहरों को निकालने का अंगरेज़ सरकार का मक़सद वाकई में न केवल पूरा हुआ, बल्कि ये हमारे आधुनिक प्रशासकों और आईएएस अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि वे किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझें। अंगरेज़ों से हमें यह सीख तो लेनी ही चाहिए कि उनकी तरह अगर हम काम करें तो हम समस्याओं को दूर कर सकते हैं, अपराधों से लड़ सकते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने राजों-महाराजों की झूठी प्रशस्तियां कब तक पढ़ते रहेंगे और विदेशी आक्रांत के रूप में आए अंगरेज़ प्रशासकों की खूबियों और अच्छाइयों को निष्पक्ष होकर ग्रहण करने का काम कब करेंगे? हमें अपनी क्रूरताएं सदा करुणा के निर्झर लगती हैं। हमें अपनी मूर्खताएं बुद्धिमत्ता की प्रज्वलित ज्योतियां प्रतीत होती हैं। हमें अपने खलनायक दिव्य आत्माएं लगती हैं। लेकिन सच यही है कि आज हम एक आज़ाद और सबल देश हैं। हमें हर चीज़ को क्रिटकली ही देखना चाहिए। गंगनहर लाना तो दूर, गंगनहर का कनसेप्ट तक गंगासिंह के दिमाग में नहीं आ सकता था। यह अंगरेज़ों का काम था और उन्होंने किया। अंगरेज़ों ने गंगनहर ला दी, लेकिन गंगासिंह से लेकर आज के शासक तक पानी का सही बटवारा नहीं करवा सके। हमारे इंजीनियरों ने अपनी इंजीनियरिंग की समस्त मेधा को कलंकित कर दिया है। हमारे प्रशासनिक अधिकारी किसानों को कभी सही पानी नहीं दिला पाए। किसान मुड़ढ़ और टेल के पाटों में कारुणिक ढंग से पिस रहा है।

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त्रिभुवन की अनुमति से उनकी फेसबुक प्रोफाइल से लिया गया

 

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