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​हिंदुओं को समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) के नुक्ते समझने होगें

सामाजिक यायावर


भारत में जब भी कामन सिविल कोड की बहस शुरू होती है तब यह बहस मुसलमान धर्म की कुछ बातों जैसे चार पत्नियां रखने की अनुमति उनके धर्म में होना व तीन बार तलाक बोल कर तलाक हो जाने जैसी बातों तक ही सीमित रह जाती है। यूं लगता है कि जैसे कामन सिविल कोड का नाम केवल कामन सिविल कोड है किंतु इसमें कामन व सिविल जैसा कुछ है ही नहीं। क्योंकि कामन सिविल कोड की बहस मुसलमान धर्म में चार विवाहों की अनुमति व तीन तलाक आदि तक ही सीमित हो जाती है। यूं लगता है जैसे बहस कामन सिविल कोड पर न होकर एंटी-मुस्लिम कोड पर होनी है।

गहराई से देखने पर दिखने लगता है कि कामन सिविल कोड के लागू न हो पाने में सबसे अधिक पेंच तो हिंदू धर्म से आएंगें। चूंकि मुस्लिम घृणा को हिंदुत्व, महानता, विश्वबंधुत्व, संस्कृति, संस्कार, राष्ट्रभक्ति व सहिष्णुता आदि मानने वाले हिंदुओं को यह लगता है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करना होगा। सच तो यह है कि इन लोगों को कामन सिविल कोड के ककहरे का भी अंदाजा नहीं।

प्रासांगिक यथार्थ तो यही है कि वास्तव में कामन सिविल कोड एक असमाधानित मुद्दा है जिसे हिंदुओं के अंदर एंटी-मुस्लिम भावना को हवा देते रहने के लिए जीवित रखा जाता है।

मुस्लिम व हिंदू समाजों में वैधानिक/अवैधानिक एक से अधिक पत्नियां :

मुस्लिम समाज में चार पत्नियां रखने की अनुमति है लेकिन बहुत ही कम प्रतिशत होगा जो वास्तव में एक से अधिक पत्नी रखने की माली हैसियत रखता होगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नियां रखने वाले लोग नहीं होगें। होगें जरूर होगें लेकिन प्रतिशत बहुत ही कम है।

मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति होने के बावजूद भारत में जितने प्रतिशत मुसलमान एक से अधिक पत्नियां रखते होगें। हिंदूओं में एक से अधिक पत्नियों की अनुमति न होने के बावजूद उससे अधिक प्रतिशत हिंदू रखैलें व दूसरी पत्नियां रखते होगें। बेहतर हो कि हिंदुओं को भी एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार दे दिया जाए। चोरी छिपे रखैल रखने या दावपेंच करके दूसरी पत्नी रखने से बेहतर होगा कि खुल्लमखुल्ला अधिकार मिल जाएं।

मैंने तो ऐसे ऐसे हिंदू देखे हैं जो अपनी दो-दो पत्नियों को साथ लेकर खुलेआम घूमते हैं। दोनों पत्नियों से संतानें। यात्रा करते समय कार की सीट में वे बीच में बैठते हैं और उनके दोनों बगल उनकी दो पत्नियां बैठतीं हैं। दो पत्नियों के अलावे रखैंलें अलग से।

बहुत हिंदू ऐसे हैं जो दबंग नहीं हैं, पारिवारिक कलह को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, वे रखैंले रखते हैं। रखैल को बाकायदा अलग घर देते हैं, महीने का पूरा खर्चा, रखैल से बच्चे भी उनका पूरा खर्चा। मतलब यह कि समानांतर एक और परिवार चलाते हैं। अंतर केवल यह कि रखैल को वैधानिकता नहीं हासिल।

मुस्लिम समाज व हिंदू समाज में वैधानिक अवैधानिक तरीके से एक से अधिक पत्नियां या सहपत्नियां रखने वालों का प्रतिशत लगभग बराबर ही होगा। इसलिए व्यवारिक व चारित्रिक अंतर तो कुछ रहा नहीं।

आदिवासी समाजों में एक से अधिक पत्नियां :

भारत के आदिवासी समाजों में अधिकतर आदिवासी समाज पुरुष सत्ता की परंपरा वाले हैं। मुस्लिम धर्म में अधिकतम चार पूर्णकालिक पत्नियां रखने का अधिकार है। लेकिन भारत के अधिकतर आदिवासी समाजों में तो ऐसी व्यवस्था है कि आदिवासी पुरुष जितनी मर्जी हो उतनी पत्नी रख सकता है। यह भी एक कटु सत्य है कि भारत में अधिकतर आदिवासी लोग जिनका शहरीकरण नहीं हुआ है उनमें से अधिकतर लोग एक से अधिक पत्नियां रखते हैं। मैं अपने जीवन में ऐसे हजारों आदिवासियों से मिला हूं जिनके पास एक से अधिक पत्नियां हैं। या यूं कहूं कि जितने आदिवासियों से मिला हूं उनमें से अधिकतर के पास एक से अधिक पत्नियां हैं/थीं। आदिवासियों में एक से अधिक पत्नी रखना इसलिए भी आसान है क्योंकि महिला ही खेतों में काम करती है, जंगल से जंगल-उत्पाद चुन कर लाती है और उसके द्वारा किए गए उत्पादन पर उसके पति का मालिकाना हक होता है। तो जिसके पास जितनी अधिक पत्नियां उसकी उतनी अधिक आय। पत्नी को खाना, कपड़ा और झोपड़ी में एक कोना मिल जाए, बस यही बहुत है। इसमें भी खाना पत्नी ही बनाती है, कपड़े भी पत्नी ही बनाती है, झोपड़ी भी पत्नी ही बनाती है फिर भी यह सब पति के द्वारा दिया गया माना जाता है। इसलिए अधिकतर आदिवासियों ने जिनके पास कुछ पेड़ या कुछ जमीन है, मतलब खाने का जुगाड़ हो, एक से अधिक पत्नियां रख रखीं हैं।

कामन सिविल कोड :

अभी हिंदुओं के मंदिरों में बहुत ऐसे मंदिर हैं जिनके विवाह प्रमाणपत्र को वैधानिक दर्जा प्राप्त है। हिंदू रीतियों से होने वाले विवाहों का विवाह विभाग में पंजीकरण करवा लिया जाता है, क्योंकि हिंदू रीति से विवाह को मान्यता प्राप्त है। कामन सिविल कोड के लागू होने पर या तो हिंदुओं से यह सुविधाएं छिन जाएंगीं या सभी धर्मों को वर्तमान में प्राप्त सुविधाएं मिलती रहेंगी। कामन सिविल कोड का मतलब ही यही है कि सभी नागरिकों के लिए समान संहिता। इसका यह मतलब कतई नहीं कि समान सहिंता में हिंदू धर्म के तौर तरीके होगें। या तो सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं बरकरार रहेंगीं या सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं खतम कर दी जाएंगीं। जो भी होगा वह सभी के लिए समान होगा।

यदि ये सुविधाएं बरकरार रहतीं हैं तो कामन सिविल कोड का औचित्य ही खतम हो जाता है। यदि खतम कर दी जातीं हैं तो हिंदू लोग भी कितना तैयार होगें यह विचारणीय तथ्य है। क्योंकि अभी तो हिंदुओं की कल्पना यही है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म के रीति रिवाज।

कामन सिविल कोड यदि धर्मों की इन सुविधाओं को खतम करता है जो करना ही पड़ेगा तो पारंपरिक विवाहों की मान्यता खतम हो जाएगी। भले ही कई लाख लोगों के सामने अग्नि के सत्तर फेरे लीजिए लेकिन विवाह अवैधानिक होगा, अमान्य होगा। विवाह किसे कहा जाए इसकी परिभाषा तय होगी जो किसी धर्म के रीति रिवाजों की बजाय सभी नागरिकों के लिए समान होगी।

आदिवासी समाजों के अधिकतर विवाह अमान्य घोषित हो जाएंगें।

दरअसल कामन सिविल कोड बहुत ही टेढ़ी खीर है, बहुत ही अधिक पेंचदार चूड़ी है। अभी भारत के लोग कामन सिविल कोड के लिए मानसिक व सामाजिक रूप से तैयार भी नहीं हैं। हंगामा तो इसलिए होता है क्योंकि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू सिविल कोड या एंटी मुस्लिम कोड मान लिया जाता है। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है जो हिंदू सिविल कोड को कामन सिविल कोड मान लिया जाएगा। हिंदू सिविल कोड में भी किस जाति की परंपरा को हिंदू सिविल कोड माना जाए, यह भी बहुत पेंचदार है।

हिंदू जब कामन सिविल कोड के समर्थन की बात करता है तो यह भूल जाता है कि उनके धर्म में हजारों जातियां व उपजातियां हैं, सबने दूसरे से अलग दिखने के लिए अपने लिए अलग-अलग रीति रिवाज व परंपराएं बनाई हैं, जो कामन सिविल कोड के लिए सबसे बड़े रोड़े बनेंगें, जब भी कामन सिविल कोड की गंभीर बहस शुरू होगी। अधिकतर हिंदुओं की मान्यता में तो कामन सिविल कोड को एंटी-मुस्लिम कोड या हिंदू सिविल कोड के रूप में देखा समझा जाता है इसलिए वास्तविक व बारीक नुक्तों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है, न ही जानने समझने की चेष्टा ही की जाती है।

चलते – चलते :

 

कामन सिविल कोड में सबसे बड़ी बात यह होगी कि किसी भी परिस्थिति में एक से अधिक पत्नी रखना अवैध होगा, क्योंकि स्त्री भी एक नागरिक है। यदि पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार होगा तो स्त्री को भी एक से अधिक पति रखने का अधिकार होगा। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक पति कई पत्नी रखे और उसकी पत्नियां कई-कई पति। इसलिए उन हिंदुओं का क्या होगा जिन्होंने दो-दो या तीन-तीन पत्नियां कर रखीं हैं। हिंदू को एंटी-मुसलमान आवेश से बाहर निकल कर कामन सिविल कोड की जमीनी हकीकत को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

 

सभ्य लोगों के सभ्य देश का कानून किसी धर्म विशेष के प्रति घृणा के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है। फिलहाल तो कामन सिविल कोड असमाधानित मुद्दा रूपी जिन्न है, जो बाहर तो निकाल लिया जाता है लेकिन उसे लागू कर पाना तो बहुत दूर की बात है, उसका आकार प्रकार व परिभाषाएं कैसीं हों यह ही उचित व व्यवस्थित रूप से नहीं तय हो पाया है।

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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