भारत बनाम पाकिस्तान संभावित युद्ध : खरी खरी

सामाजिक यायावर


दरअसल हम भारतीय जो बात बात पर पाकिस्तान में भूसा भर देंगें। पाकिस्तान को मजा चखा देगें, धूल चटा देंगें आदि भावनाओं से ओतप्रोत पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद में रहते हैं। उसके पीछे का बहुत बड़ा कारण हमारे दिमाग में बैठी यह सोच है कि पाकिस्तान हमारे सामने भुनगा है और हम उसे चुटकियों में मसल देंगें।

पाकिस्तानी अपना गाल बजाते हैं, भारतीय अपना गाल बजाते हैं। दोनों देशों के लोग अपने अपने देश की तुलना अपने दूसरे देश भारत या पाकिस्तान से करते हैं। दोनों देशों के लोगों की राष्ट्रप्रेम से संबंधित दुनिया एक दूसरे को गालियां देने, नफरत करने व हिंसक भावनाओं की अभिव्यक्ति जैसे क्रिया प्रतिक्रिया तक अधिकतर सीमित रहती है। दोनों देशों के लोग आपसी नफरत में इस कदर धंसे हुए हैं कि जीवन का असल मायने समझने व जीने की ओर कोशिश करना तो दूर की बात यदि गाहे-बगाहे इन देशों के कुछ नागरिक कोशिश करते भी हैं तो उन्हें देशद्रोही करार दिया जाता है।

दोनों ही देश कुंठित हैं, समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनो ही देशों के अधिकतर लोग सामंती सोच के हैं, दिखावटी व दोहरेपन की जिंदगी जीने में लिप्त रहते हैं।

इसी सोच के मेरे एक मित्र ने कहा कि भारत पाकिस्तान में भूसा भर देगा। मैंने कहा कि हवाई लफ्फाजी करना हो तो चर्चा यहीं खतम करें। यदि कुछ हकीकत व ठोस बात करनी हो तो कुछ बात हो सकती है।

मैंने कहा कि बांग्लादेश जब अलग हुआ था यदि उस युद्ध की बात यदि छोड़ दी जाए क्योंकि उस युद्ध में पाकिस्तान दोतरफा मार झेल रहा था और पाकिस्तान के लिए भौगोलिक परिस्थितियां कुछ ऐसी विकट थीं कि उसको युद्ध हारना ही था। बाकी जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें भारत पाकिस्तान थोड़ा बहुत कम अधिक लगभग बराबरी पर ही छूटे हैं। यदि भारत ने पाकिस्तानी इलाके कब्जाए हैं तो पाकिस्तान ने भारतीय इलाके कब्जाए हैं। दोनों तरफ के सैनिक हताहत हुए हैं जबकि भारत के पास पाकिस्तान से लगभग दुगुनी सेना है। कारगिल में जो युद्ध हुआ उसका लब्बोलुआब यह था कि भारत ने पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा कब्जाई गईं भारतीय चौकियां आदि छुड़वा लिए थे। कारगिल का युद्ध एक सीमित युद्ध था जो केवल कब्जाई गई चौकियों के इलाकों तक ही लगभग सीमित रहा।

भारत व पाकिस्तान दोनों की ही सैन्य क्षमता विदेशों पर आश्रित है। हथियारों के आविष्कार व उनकी तकनीक का विकास भारत या पाकिस्तान नहीं करते हैं। जो हथियार मिल गए उन्हीं में कुछ छोटे-मोटे यूं कहें कि सिर्फ स्वदेशी घोषित करने के लिए दिखावटी बदलाव करके स्वयं को स्वयंभू तुर्रमखां घोषित कर लिया जाता है।

सैनिकों की संख्या को यदि छोड़ दिया जाए तो दोनों देशों की सैन्य क्षमता में बहुत अधिक का अंतर नहीं। इतना अंतर तो कदापि नहीं है कि भारत या पाकिस्तान में से कोई भी देश युद्ध के माध्यम से दूसरे में भूसा भर दे, नेस्तनाबूत कर दे। युद्ध यदि सैनिकों की संख्या से जीते जाते होते तो भारत न अरबों का गुलाम बनता न ही डचों का गुलाम बनता न ही फ्रासीसियों का गुलाम बनता न ही पुर्तगालियों का गुलाम बनता और न ही अंग्रेजों का ही गुलाम बनता। मुठ्ठी भर आए लोगों ने भारत को सैकड़ों सालों तक गुलाम बनाए रखा। भारतीय समाज में कहीं कुछ तो ऐसी कमजोरी जरूर ही होगी जो भारत को मुठ्ठी भर लोग न केवल गुलाम बनाते रहे वरन् गुलाम बनाए रखने में सफल भी रहे।

संभवतः उन्हीं कमजोरियों के चलते अतिसंवेदनशील व अतिसुरक्षित सेना के मुख्यालयों वाले इलाकों में भी बाहरी लोग आराम से हथियार सहित घुस आते हैं और अत्यधिक प्रशिक्षित व आधुनिक हथियार संपन्न सैनिकों की हत्याएं कर जाते हैं। लेकिन हमें ऐसा क्योंकर हुआ, इन सब बातों को देखने, समझने व सुधारने जैसे मुद्दों में धेला भर भी रुचि नहीं। हमें इन सबसे कोई मतलब नहीं।
हमें तो पाकिस्तान को गलियाने रूपी सड़कछाप राष्ट्रभक्ति के नशे को जीना है।

इसलिए हम अपनी सैन्य व सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमजोरियों को देखने व सुधारने की बजाय, समय-समय पर अनेक बार हो चुकी सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सामान्य व कामचलाऊ सैन्य कार्यवाही को मजा चखा दिया, बदला ले लिया, घर में घुस कर मारा, इतिहास में पहली बार हुआ जैसे वाहियात, बेहूदे व उटपटांग तरीके से महिमामंडित करते हुए अपने ही देश की छीछालेदर में जुट जाते हैं।

भारत व पाकिस्तान दोनों मिसाइल बनाते हैं, दोनो देशों के अपने अपने मिसाइल मैन हैं जिनको महान वैज्ञानिक का स्वयंभू दर्जा दिया जाता है। दोनो देशों के अपने अपने महान परमाणु वैज्ञानिक हैं। दोनो देशों के लोगों ने विदेशों में पलायन करके अपने लिए मुकाम बनाए हैं। इन प्रायोजित व तथाकथित राष्ट्रगौरवों से इतर बहुत कड़वा व नंगा यथार्थ यह भी है कि भारत व पाकिस्तान दोनों देश भले ही कितनी शिद्दत से झूठा दावा करें कि उन्होने मिसाइल, परमाणु बम व राकेट आदि खुद ही विकसित किए हैं, लेकिन दोनो देश तकनीक की चोरी करते हैं व विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं।

हममें इतनी भी सहज बुद्धि नहीं कि हम इस यथार्थ को स्वीकार कर पाएं कि भारत व पाकिस्तान दोनो ही देश सैन्य क्षमता पर आत्मनिर्भर नहीं। दोनों देश लंबे समय तक युद्ध नहीं झेल सकते हैं। कुछ दिनों के युद्धा के बाद ही दोनों देश चाहेंगें कि कोई तीसरा आकर बीच-बचाव करे और युद्ध रुक जाए, कोई समझौता हो जाए। अधिक समय तक युद्ध में दोनों ही देशों के पास हथियार नहीं रहेंगें क्योंकि दोनों ही देश विदेशों पर आश्रित हैं। समझौता होने के बाद दोनों देशों की सेनाएं अपने देशवासियों के सामने अपनी-अपनी पीठ ठोकेंगें, अपनी-अपनी विजय बताएंगें। ऐसा करके लोगों के अंदर आपसी नफरत को जिंदा रखेंगें। सत्ताओं के वजूद के लिए यह फरेब जरूरी भी है।

दोनो ही देशों के अधिकतर लोगों की सोच व मानसिकता अवैज्ञानिक है तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का तिरस्कार करती है, उपेक्षित करती है। दोनो ही देश एक दूसरे के प्रति नफरत को राष्ट्रभक्ति की कसौटी मानते हैं। चूंकि दोनों देश बचकानी हरकते करते हैं। सैन्य व्यवस्थाओं पर आत्मनिर्भर नहीं हैं। इसलिए यदि किसी कारण वश समझौता न हो पाया तो यदि अपनी मूर्खतावश परमाणु अस्त्रों का दुरुपयोग कर दिया तो क्या होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इतना तो तय है कि यदि इनमें से कोई भी एक देश परमाणु का प्रयोग करेगा तो दूसरा देश करेगा ही।

भारत के विकृत मानसिकता के लोग तो बयान दे ही रहे हैं कि कुछ परमाणु बमों के प्रयोग से कुछ प्रतिशत लोगों का ही नुकसान होगा लेकिन शेष देश तो पाकिस्तान को नष्ट होते देख सकेगा। ऐसे मानसिक विकृत लोगों की दृष्टि में व्यक्ति, समाज, देश व जीवन के मायने क्या हैं यह समझना मानवीय संवेदनशीलता व मूल्यों के परे की बात है।

दोनो ही देशों के तंत्र अपने नागरिकों के लिए असंवेदनशील, निष्ठुर, गैरजिम्मेदार व भ्रष्ट हैं। दोनो ही देशों में अधिकतर लोग शोषित हैं। दोनों ही देशों में हंगामा करने को लफ्फाजी करने को राजनीति माना जाता है। दोनो ही देशों के नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों का चरित्र लगभग एक जैसा है। पता नहीं किस लफ्फाजी व फूहड़ता के आधार पर दोनों देशों के लोग एक दूसरे का नाम दुनिया के नक्शे से मिटाने की हवाई बात करके अपने अपने सैडिज्म को जीते हैं।

पाकिस्तानियों से तो नहीं कह सकता लेकिन अपने देशवासियों से निवेदन जरूर करना चाहता हूं कि कोई देश व समाज लफ्फाजी व फूहड़ता व सैडिज्म से महान नहीं बनता, मजबूत नहीं बनता। देश मजबूत बनता है जब देश के लोग मजबूत होते हैं जब देश का समाज व तंत्र व ढांचा मजबूत बनता है। बनाइए अपने देश को मजबूत। जिस दिन आप अपने देश को वास्तव में बिना सैडिस्ट लफ्फाजी के मजबूत बना लेंगें पाकिस्तान जैसे सड़ियल देश की बात छोड़िए दुनिया का कोई देश अमेरिका तक भी आपसे ऊंची आवाज में बात तक करने की हिम्मत नहीं करेगा।

दरअसल देश के निर्माण की प्रक्रिया गंभीरता व आंतरिक मजबूती से होती है। और यही गंभीरता व आंतरिक मजबूती वास्तव में असल देशप्रेम व राष्ट्रभक्ति होता है। लफ्फाजी, बकैती, ओछेपन व लुच्चई आदि से भरा सैडिज्म राष्ट्रभक्ति नहीं होती, बिलकुल भी नहीं होती।

 

मैं अपने आपको देशभक्त मानता हूं और उन सभी को देशभक्त मानता हूं जो देश के लोगों के लिए अपना जीवन लगाते हैं, संघर्ष करते हैं, रचना करते हैं। भारत की आज जो स्थिति है उसमें हर गंभीर देशभक्त युद्ध का विरोध करेगा। मैं भी युद्ध का विरोध करता हूं क्योंकि मैं अपने देश को बनते हुए आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं।
लफ्फाजों का तो काम ही है लफ्फाजी करना।

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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