चाइनीज माल का बहिष्कार बनाम हमारी खोखली राष्ट्रभक्ति

सामाजिक यायावर


इधर कुछ दिनों में जब से चीन ने पानी बंद किया। जब से चीन भारत में 30 से 40 किलोभीटर अंदर आकर अपनी अस्थाई छावनी बना गया। तब से हम लोगों में चाइनीज माल का बहिष्कार करने की चुल्ल उठ रही है। ऐसा करने वालों में शातिर ओछे राष्ट्रभक्तों से लेकर भोलेभाले जेनुइन राष्ट्रभक्त तक शामिल हैं।

दरअसल इन लोगों को लगता है कि चाइनीज माल मतलब सस्ते मोबाइल, सस्ते खिलौने, दीपावली की बिजली की लड़ियां, प्लास्टिक वाला चावल व दाल, सस्ते जूते, सस्ते कपड़े आदि है।

इन लोगों को चाइना की ताकत का अंदाजा नहीं। चाइना सस्ते से लेकर बहुत बेहतर गुणवत्ता की चीजें बनाता है। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का महंगा ब्रांडेड सामान जैसे टीवी, फ्रिज, एसी, लैपटाप, आईफोन, महंगे मोबाइल्स, महंगे ब्रांडेड कपड़े आदि सबकुछ चीन में बनता है।

हो सकता है कि कैनन कंपनी का कई लाख रुपए की कीमत का जो महंगा लेंस आपने अपने SLR कैमरे में लगा रखा हो वह चीन का बना हो। NIKON का तो अधिकतर सामान चीन में ही बना होगा।

हो सकता है सैमसंग, नोकिया, आईफोन, एलजी, एचटीसी आदि महंगी व ब्रांडेड कंपनियों का जो मोबाइल आप चौड़े से इस्तेमाल कर रहे हों वह चीन का बना हो।

हो सकता है कि आपके घर का महंगा टीवी, फ्रिज, एसी, गीजर, बाथटब, ओवन, माइक्रोवेव, कालीन, टाइल्स आदि जिसे आप अमेरिका या अन्य किसी देश का बना मानकर अपने बड़े होने के अहंकार में जीते हों, वह सामान बेसिकली चीन का बना हो सकता है।

जिन बहुत महंगी कारों व मोटरसाइकिलों में दूसरों को अपने जूते के नीचे का आदमी समझते हुए आप घूमते हों उस कार या मोटरसाइकिल के कई या बहुत या सारे कलपुर्जे चीन में बने हो सकते हैं।

ये जो गांव गांव में सोलर लाइट लगी होती है, यह जो आपके घर में सोलर पैनल लगा है यह चीन का बना हो सकता है या इसके कई पुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

चौकिएगा नहीं यदि राफेल विमान में लगे कई पुर्जे या लगभग सारे पुर्जे चीन के बने हों। एयरइंडिया के जिन विमानों में आप उड़ते हैं उनके कलपुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

जिस बहुत महंगी फ्रेंच रेड वाइन को आप पीकर खुद को विश्वस्तरीय समझते होगें वह चाइनीज ओनरशिप की हो सकती है जबकि आपने उस बोतल को खुद फ्रांस से खरीदा हो।

ये तो खैर कुछ भी नहीं। भारत में बहुत ऐसी भारतीय कंपनियां हैं जिनको हम स्वदेशी समझते हैं जिनके उत्पादों में मेड इन इंडिया लिखा रहता है जबकि उस उत्पाद में लगा सामान चीन में बना होता है, भारतीय कंपनियां चीन के सामान को जोड़ करके (एसेंबल) करके उत्पाद बनाकर मेड इन इंडिया छाप देती हैं।

भारत की एक बहुत बड़ी मोबाइल कंपनी है जिसका अधिकतर सामान चीन का बना होता है लेकिन उसके सामानों पर मेड इन चाइना की बजाय कुछ और भी छपा हो सकता है।

सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर कब तक हम सड़कछाप सोच व मानसिकता को खुद से लपेटे रहेंगें। सवाल यह खड़ा होता है कि हम कब इतने इमानदार व गंभीर होगें कि हम यह समझ पाएं कि बकैती से, छिछलेपन से, छिछोरेपन से, सतहीपन से किसी समाज व देश का विकास नहीं होता, मजबूती नहीं मिलती।

हमारा देश भारत तब मजबूत होगा जब हम ठीक से देख पाने की दृष्टि विकसित करेंगें, जब हम अपनी कमजोरियों को स्वीकारना सीखेंगें। बकैती व लफ्फाजी करना बंद करेंगें।

टटपुंजिया दिखावटी ईमानदारी, विद्वता, समझदारी व सामाजिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर ठोस रूप में होने का प्रयास करेंगें।

यथार्थ से मुंह मोड़कर फिजूल के फर्जी नारे देने से, बेहूदे तर्क देने से व कोरी हवाई भावुकता से यथार्थ नहीं बदलते हैं।

सच्चा राष्ट्रभक्त वह है जो देश व समाज के निर्माण के लिए काम करे, संघर्ष करे, त्याग करे.
न कि अपने ही लोगों को चोरी व झूठ से लूट कर या ढकेमुंदे करप्शन से अपने घर में सुविधाओं का सामान भरे, बाजार का उपभोक्ता बने, तिजोरी भरे और खुद को बड़ा आदमी मानने के बेहूदे अहंकार में जिए।

 

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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