गौ-सेवक बनाम गौ-रक्षक


विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह

विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
* लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर
* मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
* संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह

लगभग दो साल पहले की बात है मैं अपनी टीम के साथ राजस्थान राज्य के कई जिलों के अनेकों गावों में जलसंग्रहण, नारीसमृद्धता, आर्थिक विकास, शिक्षा व कृषि आदि के कामों को समझने के लिए यात्राएं कर रहा था। इसी प्रक्रिया में मेरा ऐसे गावों में भी जाना हुआ जहां की जनसंख्या का 95% मुसलमान थे, इनमें से कुछ गावों में मतदाताओं की संख्या 10,000-15,000 के लगभग थी।

ये गांव मुसलमान बहु्ल्य वाले बड़े गांव थे। मुझे व मेरे साथियों को इन गांवों के कई घरों में बहुत सम्मान व प्रेम से शाकाहारी भोजन कराया गया। इन गांवों में पानी के लिए लगभग हर घर में टांके बने हुए थे। पानी का स्रोत टांके थे। राजस्थान व जलसंग्रहण को समझने वाले भलीभांति टांकों व टांकों का जीवन से रिश्ता समझते हैं।

इन गांवों में चलने वाले मदरसों में मैंने गौशालाएं देखीं, जिनकी देखभाल मुसलमान बंधु करते थे। मैंने पूछा कि ये गाएं कहा से आती हैं तो उनका जवाब था कि आप हिंदू भाई लोगों की गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो वे या तो हमारी गौशालाओं में गाएं छोड़ जाते हैं या उनको ऐसे ही अवारा छोड़ देते हैं। इन गौशालाओं में अपवाद छोड़कर सभी गाएं ऐसी ही थीं।

इन गौशालाओं के चरवाहे मुसलमान थे। मैंने खुद अपनी आंखों से इन मुसलमान चरवाहों के गायों के साथ आत्मीय रिश्ते देखे। चरचाहे की आवाज पर रंभाती हुई गाएं दूर-दूर से चराई छोड़ कर विश्वास भाव के साथ चरवाहे के पास चली आतीं थीं।

बचपन से मेरे दिलोदिमाग में यह अनुकूलता (कंडीशनिंग) घुसा दी गई थी कि मुसलमान मतलब हिंसक मनुष्य। मैं अपने जीवन में लगभग दो दशक से अधिक इसी पूर्वाग्रह में जीता रहा कि मुसलमान मतलब गाय व आदमी को काट देने वाला बर्बर मनुष्य।

मैंने जब इन गावों के मौलवियों आदि से पूछा कि मुसलमान व गाय का यह रिश्ता मेरी समझ के बाहर है। मुझे जवाब मिला कि मुसलमान का गाय व बकरी से बहुत गहरा  आर्थिक रिश्ता है। आर्थिक रिश्ता ही हमें गाय व बकरी को संरक्षित करने व उनकी सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनका कहना था कि गाय की बजाय यदि बकरी की बात की जाए तो बकरी तो हमारे भोजन का प्रमुख हिस्सा है, बकरीद में हम बकरों की बलि देते हैं। लेकिन बकरी सबसे अधिक मुसलमान ही पालता है, बकरी की सेवा सबसे अधिक मुसलमान ही करता है।

उनका कहना था कि प्रतिबंध लगाने से समाज पशुओं की सेवा करने के लिए प्रेरित नहीं होता है। पशुओं को यदि मनुष्य के आर्थिक लाभ व उपयोगिता से जोड़ दिया जाए तो समाज का बड़ा तबका जो गरीब होता है वह पालतू पशुओं की सेवा अपने आप करता है।

उनका कहना था कि डेयरी की बहुत योजनाएं सरकारों की विभिन्न माध्यमों से चलती रहती हैं। लोग खूब फर्जीवाड़ा करते हैं लाखों करोड़ों रुपए की सरकारी ग्रांट व सरकारी योजनाओं के तहत बैंकों से लोन लेते हैं। एक-एक डेयरी पर कई-कई ग्रांट लेते हैं। डेयरी का अधिकतर पैसा हजम कर लिया जाता है। कुछ दिन चलाई जाती है फिर सिर्फ कागजों में चलती है या घसीट-घसाट कर चलाई जाती है। कुछ लोग डेयरी की गायों को लोगों में बांट कर खुद को महान समाजसेवी दिखाने का नीचता भरा ढोंग भी कर लेते हैं। जबकि उनसे जितना बन पड़ा उतना लूटघसोट डेयरी की योजनाओं से कर चुके होते हैं।

उनका कहना था कि जब डेयरी के हालात यह है तो सरकारी योजनाओं व लोगों से चंदे वसूल कर चलने वाली गौशालाओं का हाल न पूछिए। उनका कहना था कि जैसे कि मुसलमान गायों को लेकर बदनाम है लेकिन हमारे जैसे लोग अच्छी गौशालाएं चला रहे हैं, गायों की सेवा कर रहे हैं जबकि हमें ग्रांट नहीं मिलती है। उसी तरह देश में कुछ लोग ईमानदारी से गौशालाएं व डेयरी भी चलाते हैं। लेकिन देश भर में डेयरी की सरकारी योजनाओं व गौशालाओं में जमकर फर्जीवाड़ा है।

चलते-चलते ….

cowबुंदेलखंड में स्थिति यह है कि एक गांव के लोग बंदूके लेकर दूसरे गांव के लोगों पर ताने रहते हैं ताकि दूसरे गांवों की गाएं उनके गांव में न आ जाएं। हर गांव में सैकड़ों हजारों गाएं अवारा घूम रही हैं, किसानों की फसलें बर्बाद कर रहीं हैं। किसान पूरी रात बंदूकें लिए खेतों में सोने के बाध्य हैं। किसान गायों से अपनी फसलों को बचाने के लिए बंदूकों से हवा में फायर करते हैं। गाएं हांकी जाती हैं, जहां हांकी जाती हैं वहां से वे फिर अन्यत्र हांकी जाती हैं। बस यही चल रहा है।

पिछले दो वर्षों में सैकड़ों किसान जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी हमेशा गाएं पालते रहे, ने अपने घर में गाय रखना छोड़ दिया। इनमें से बहुतों ने तो अपनी दुधारू गाएं ऐसे ही अवारा छोड़ दीं ताकि उनके पास कोई गौ-रक्षक उगाही करने न आ जाए। कुकरमुत्तों की तरह गौ-रक्षक दल व अभियान उगे हैं।

मेरा सुझाव है कि गाय को आर्थिक रूप से देखा जाए न कि धर्म की मजबूरी। तभी गाय का वास्तव में संरक्षण व पोषण हो पाएगा। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन गाय भी विलुप्त प्रजातियों की ओर बढ़ जाए।

यदि देश के किसान व गरीब तबके ने गाय से अपना रिश्ता तोड़ लिया तब कोई भी ताकत भारत में गाय को विलुप्त होने से नहीं बचा सकती है।

तय हमें करना है कि हम ढोंग करेंगें, ढपोरशंखी करेंगें या हम अंदर से ईमानदार होना चाहेंगें।

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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