अतिपिछड़े इलाके के युवा के बदलते चरित्र की सच्ची कहानी

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मैं जब से सामाजिक परिवर्तन व विकास के लिए समझदार हुआ हूं तब से मैंने अपने मन में केवल दो तत्वों पर ही भाव रखे हैं। “मुद्रा विहीन अर्थव्यवस्था व सामाजिक स्वामित्व।”
 
मजबूरी न हो तो मैं मुद्रा का प्रयोग अभी इसी क्षण से बंद कर दूं। रही बात सामाजिक स्वामित्व की तो मैं व मेरी पत्नी व्यक्तिगत संपत्तियों के लिए प्रयास नहीं करते हैं। हमने अभी तक कोई जमीन, घर, दुकान आदि अचल संपत्ति नहीं खरीदी है। जबकि यदि संपत्ति खरीदना हमारा मकसद होता तो काफी संपत्तियां खरीद चुके होते।
 
घर में उपयोगिता के सामान ही खरीदे जाते हैं। भारत में माइक्रोवेव, ओवन आदि केवल इसलिए नहीं खरीदे गए क्योंकि इन यंत्रों की उपयोगिता आज तक समझ नहीं आई। जब तक कार से भारत भ्रमण करने की योजना नहीं बनी तब तक कार भी नहीं खरीदी थी।
 
आज भी कार का प्रयोग भारत में भ्रमण करने के लिए ही होता है। दिल्ली में हमने कभी कार नहीं रखी। मैंने व मेरी पत्नी ने सदैव मेट्रो, आटो, रिक्शा या पैदल ही यात्रा की। जब भारत भ्रमण नहीं करता हूं तब कार दिल्ली से कई सौ किलोमीटर दूर मेरे विश्वसनीय मित्र के यहां खड़ी रहती है। मैं जिस स्थान में कार खड़ी कर आता हूं वहां से महीनों एक इंच भी नहीं खिसकती है, भले ही खड़े-खड़े सड़ जाए।
अब चूंकि भारत से लंबे समय के लिए जा रहे हैं तो लाखों रुपए का घरेलू सामान मित्रों व माता पिता को मु्फ्त देकर जा रहे हैं। जबकि कई मित्रों का सुझाव था कि आनलाइन सामान बेच कर मैं कई लाख रुपए कमा सकता हूं। मैंने कहा कि यदि मुझमें व मेरी पत्नी में योग्यता व कूबत होगी तो हम अपनी जरूरत का सामान फिर से खरीद लेगें। चूंकि मैं संपत्तियों पर व्यक्तिगत स्वामित्व महसूस नहीं करता इसलिए चूंकि मैं अब इन सामानों का प्रयोग नहीं करूंगा तो जो भी दूसरा इनका उपयोग करेगा वह इनका स्वामी होगा। मैं घरेलू सामान का व्यापारी तो हूं नहीं जो घरेलू सामान बेचता फिरूं।
 
मेरी पत्नी आस्ट्रेलियन हैं और एक समृद्ध व प्रतिष्ठित परिवार से हैं। उनका परिवार कई सुंदर फार्महाउसों का मालिक है जो नेशनल रिजर्व के अंदर खरीदे गए जंगलों वाले फार्महाउस हैं।
 
सिडनी जैसे दुनिया के सबसे महंगे शहरों वाले शहर में महंगे इलाकों में अत्यधिक सुविधा संपन्न कई घर हैं। रोविंग की महंगी महंगी नावों के मालिक हैं। कई-कई लाख रुपए का एक-एक बिस्तर। कई-कई हजार रुपए की एक-एक कप प्लेट आदि। घरों में खुद का अत्याधुनिक सुविधाओं वाला स्वीमिंग पूल रहा।
 
पत्नी के पिता हावर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका के टापर, कुछ वर्ष पूर्व लाइफ-टाइम अचीवमेंट जैसा कुछ सम्मान मिला हावर्ड यूनिवर्सिटी से। एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के निदेशक मंडल में रहे व एक कंपनी के जन्मदाता रहे। माता भी आर्किटेक्ट। भाई-बहन आस्ट्रेलिया के सबसे प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल के पढ़े हुए। बड़ा भाई दुनिया के कई देशों की नामचीन यूनिवर्सिटीज से पोस्ट-डाक्टरेट किया हुआ। आस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी में शोध-प्रयोगशाला का निदेशक। छोटा भाई अंडर-19 में आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम में।
 
पत्नी भी अपने माता पिता व बड़े भाई से पीछे नहीं रहीं। सिडनी यूनिवर्सिटी से जल-विज्ञान व तकनीक में PhD, कृषि-अर्थव्यवस्था विषय में अमेरिका से दुनिया के नामचीन शोध संस्थान से पोस्ट-डाक्टरेट। आस्ट्रेलिया की ओर से भारत में वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार रहीं।
 
भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति से मुलाकातें व भोजन। भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों से लंबी चर्चाएं, उनके साथ भोजन व भारत सरकार के विभिन्न विभागों के महानिदेशकों व सचिवों आदि से समय समय पर चर्चाएं उनके कामकाज की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा रहा।
 
सुविधाओं व ऐशोआराम को छोड़कर मेरे साथ भारत में सामान्य जीवन स्तर के साथ जीना। भारत के अति पिछड़े गावों में महीनों बिना सुविधाओं के बारिश में पानी गिरती फूस की झोपड़ियों में रहना। मेरे साथ गावों में पदयात्राएं करना व कभी कभार मिट्टी की सड़कों में बिना बिस्तर के सिर्फ साधारण सी चटाई में मेरी बांह को तकिया बनाकर सो जाना। कभी उफ न करना।
 
कभी घर खरीदने की इच्छा नहीं। कभी कार रखने की इच्छा नहीं। कभी जरूरत से अधिक सुविधाओं की इच्छा नहीं। कभी नहीं कहा कि मैं सामाजिक कार्यों में सारा पैसा क्यों खर्च देता हूं।
 
सामाजिक कार्यों में समय, ऊर्जा व पैसे की कमी न पड़े इसलिए शादी के 10 साल तक बच्चा पैदा करने की कोई बात नहीं, जबकि मेरी माता की सगी मौसी जैसे निकट रिश्तेदार भी मुझे नपुंसक व मेरी पत्नी को घुमा-फिराकर अप्रत्यक्ष रूप से बांझ कहते रहे।
 
लंबे समय से मैं भारत के अति पिछड़े क्षेत्रों में अकेले जाता रहा हूं, ऐसे युवाओं व लोगों को खोजने के लिए जिनके अंदर सामाजिक सोच हो और वे अपने दम पर समाज की बेहतरी के लिए अपना जीवन लगाना चाहते हों।
 
बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र व दक्षिण भारत के राज्यों में कुछ लोगों के साथ तालमेल मिला और उनके साथ विभन्न स्तरों पर कम ज्यादा ऊर्जा के साथ काम शुरू किए या चल रहे कार्यों में विभिन्न स्तरों पर मदद की।
 
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इसी प्रक्रिया में एक दशक से भी पहले भारत के एक अति पिछड़े क्षेत्र के एक सामान्य युवा से मुलाकात हुई। तब वह युवा NGOs के स्थानीय बड़े दुकानदारों के साथ काम किया करता था। मेरे साथ चर्चाओं में युवा तड़प के साथ कहता था कि वह NGO दुकानदारों के साथ काम नहीं करना चाहता है। समाज के लोगों के लिए काम करना चाहता है। समाज के लिए जीवन लगाना चाहता है।
 
मैं सामाजिक स्वामित्व पर चर्चाएं करता था। मेरी इच्छा थी कि युवा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाए और वहां चल रहे लोगों के प्रयासों को देखे व समझे।
 
इस प्रक्रिया में एक दो बार ऐसा हुआ कि युवा को स्लीपर क्लास में ट्रेन में कुछ असुविधा के साथ यात्रा करनी पड़ गई और युवा का कहना हुआ कि इन तकलीफों से कारण वह अपना रास्ता बदल रहा है।
 
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देश में हर जिले में ऐसे हजारों लाखों युवा हैं जो प्रशासन के साथ मिलकर विकास के लिए आने वाली ग्रांट्स को मंत्री, सचिव व स्थानीय प्रशासन आदि स्तरों पर अपनी सेटिंग के स्तर के आधार पर विकास के प्रोजेक्ट्स की ग्रांट्स की हिस्सेदारी से पैसा कमाते हैं। बड़े आदमी बनते हैं। संपत्तियां बनाते हैं।
 
इस प्रक्रिया में कुछ NGO वाले ऐसे भी होते हैं जो समाज के लिए कुछ काम भी कर देते हैं। जिससे उनका नाम भी होता है और उनको काम करने वाला भी मान लिया जाता है। लेकिन इनका भी एजेँडा पैसा व ग्लैमर कमाना ही होता है।
 
लेकिन इन लोगों में सभी लोग ऐसे होते हैं जो बिना ग्रांट के काम नहीं करते हैं। NGO इनके लिए व्यापार होता है। फर्जी बिल, फर्जी वाउचर, फर्जी आडिट रिपोर्ट, फर्जी साइट-रिपोर्ट की पूरी चेन होती है।
 
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मैं कई वर्षों तक एक अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग संस्था से जुड़ा रहा। कुछ समय तक आधे भारत का समन्वयक भी रहा। इसलिए भारत के विभिन्न राज्यों के सैकड़ों अच्छे व फर्जी कामों वाले NGOs के फंडिंग आधारित प्रोजेक्ट्स को देखने समझने का अवसर मिला। इनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले तिकड़मों को देखने, समझने व जानने का अवसर मिला। मेरे साथियों ने देश की 500 से अधिक NGOs को ब्लैक लिस्ट भी किया।
 
कई मैगसेसे पुरस्कृत महानुभावों के साथ बहुत नजदीक से काम करने का अवसर भी मिला। सामाजिक आंदोलनों के राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े व नामचीन संगठनों के साथ काम करने का अवसर मिला।
 
इस अवसरों से यह समझ आई कि भारत में विभिन्न प्रकार के NGOs वास्तव में कैसे चलते हैं। अच्छे व फर्जी कामों के तिकड़म क्या होते हैं।
 
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इतना सब देखते समझते हुए देश के हजारों NGOs, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि से अच्छे से मिलना व समझना होता रहा।
 
सरकारी या विदेशी ग्रांट से तिकड़म करके पैसा कमाना, कुछ काम करते भी जाना ताकि कभी कोई बात न उठे, विरोध न हो। कुछ लोग ग्राँट्स से पैसा कमाते हुए भी वास्तव में समाज के लिए कुछ करते भी रहना चाहते हैं। NGOs व सामाजिक कार्यों के इन दुकानदारों में पैसा कमाने का अंतर हो सकता है। काम करने के तरीकों में अंतर हो सकता है।
 
लेकिन इनमें से चंद अपवादों को छोड़कर लगभग सभी लोग कम से कम मुझ जैसे व्यक्ति के सामने कभी खुद को ईमानदार नहीं साबित करते हैं। कभी अपने तौर तरीकों को अच्छा नहीं बताते है। काफी लोग तो लज्जा व शर्म महसूस करते हैं।
 
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लेकिन समाज के लिए जीवन लगाने की बात करने वाले जिस युवा की बात मैं कर रहा हूं उसका चरित्र बहुत अधिक बदलते हुए मैंने देखा है।
 
आज उस युवा के लिए सामाजिक सोच कोई खास मायने नहीं रखती है। ऐसा नहीं है कि युवा बहुत अधिक पैसा कमा लेता है। लेकिन जिस समाज से ताल्लुक रखता है उसके हिसाब से आज वह बड़ा आदमी है। वह युवा और अधिक पैसा कमाना चाहता है, वह और बड़ा आदमी होना चाहता है।
 
अब तो उस युवा की स्थिति ऐसी है कि यदि उसके घर में कोई सामाजिक कार्यकर्ता जिसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो ऐसे सामाजिक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता को भी छोटा आदमी मानने व अप्रत्यक्ष रूप से अपमान करने के अहंकार में जीता है।
 
आज उस युवा की सोच की स्थिति ऐसी है कि वह यह मानता है कि सरकारी ग्रांट्स व NGO की जिस तिकड़म बाजी व नेक्सस से वह पैसा कमाता है वह व्यापार है और वह युवा अपनी मेहनत की कमाई खाता है।
 
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मेरी समझ में यह नहीं आता है कि वह युवा शुरू से ही ऐसे ही चरित्र का था लेकिन अभिनय करता था या वह शुरू में अच्छी सोच का था लेकिन बाजारूपन व बेईमानी के रास्ते पर चलने और बेईमानी का पैसा आने के कारण उसका चरित्र ऐसा हो गया है।
 
एक समय था जब मैं इस युवा के साथ सामाजिक विकास के विचारों पर घंटों चर्चाएं सहजता से कर लेता था। आज यह युवा पैसे व सुविधाओं व खुद को बड़ा आदमी के मानने के अहंकार में इस कदर जीता है कि सामाजिक विचारों पर चर्चा करना तो दूर सामान्य चर्चाएं हो पाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
 
चारित्रिक व सोच का पतन यहीं नहीं रुकता है। बच्चों व परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। लेकिन ऐसे युवाओं को अपनी संतानों के लिए सिर्फ यह दिखता है कि इनको कितनी सुविधाएं दे दी जाएं और इनके लिए कितना जमा कर लिया जाए। चारित्रिक व सोच का पतन इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं रहता। यदि मुद्दा होता तो क्या वे खुद को और अधिक पतिति होने से रोकने का प्रयास नहीं करते होते।
 
कारण कुछ भी हो लेकिन जब से सरकारी विभागों ने NGOs के माध्यम से काम करना शुरू किया है तब से समाज में अनैतिकता बढ़ी है। चारित्रिक पतन बढ़ा है। भ्रष्टाचार बढ़ा है।
 
जिस देश में पूरा का पूरा समाज व ढांचा ही भ्रष्ट होने की कगार पर खड़ा हो वहां मैं पैसे कमाने के तरीके पर सवाल नहीं उठाना चाहता हूं लेकिन चारित्रिक, सोच, विचार, भाव का पतन एक बहुत ही गंभीर बात है।
 
किसी समाज या देश या व्यक्ति या परिवार का विकास कम से कम पैसा व सुविधाओं से तो नहीं ही होता है।
 
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बहुत लोग जो मेरे जीवन व मेरे कामों के बारे में नहीं जानते हैं केवल मुझे पत्रकार, लेखक व फेसबुकिया आदि के रूप में ही जानते हैं। जिनके लिए चुनाव लड़ना, चुनाव जीतना, सरकार बनाना, अपनी अपनी पार्टियों के प्रति भक्तई दिखनाा आदि किस्म की वाहियात बातें ही सामाजिक सोच है, सामाजिक प्रतिबद्धता है, सामाजिक निर्माण है, सामाजिक परिवतर्न आदि है।
 
उनको मेरी यह बात शायद ही समझ आए कि जिस आदमी ने जीवन के लगभग 15-20 साल सामाजिक काम किया हो, वह भी बिलकुल जमीन पर उतर कर सुविधाओं व खूबसूरत कैरियर को लात मारते हुए। सामाजिक क्षेत्र के विभिन्न आयामों को नजदीक से देखा हो। व्यवहारिक सोच दिन प्रतिदिन परिपक्व हुई हो।
 
वह आदमी यदि जीवन में प्राप्त अनुभवों के आधार पर ईमानदारी से कुछ किताबें लिखकर मरना चाहता है तो यह भी गंभीर सामाजिक काम ही है। यह भी गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता ही है। यह भी सामाजिक निर्माण का प्रयास ही है।
 
किताबें व विचार ही मनुष्य, परिवार, समाज व देश को दिशा देते हैं। काश हमारे समाज के युवा गंभीर विचारों व किताबों का स्वाध्याय शुरू करें व जीवन में उतार कर जीने का प्रयास शुरू करें।
 
क्योंकि केवल यही एक मात्र रास्ता है समाज व राष्ट्र निर्माण का।
 
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सामाजिक यायावर

सामाजिक यायावर

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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