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सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता —— भारत को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी/दलित/शूद्र नेतृत्व व दिशा की जरूरत है

हमें विभिन्न आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा प्रायोजित नेतृत्वों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में स्वीकारने की आत्मश्लाघा व प्रवंचना से बाहर आने की जरूरत है भले ही प्रायोजित नेतृत्व तात्कालिक तौर पर यह कितना भी अधिक लाभप्रद व परिवर्तनकारी दिख रहा हो।

मूल बात कहने के पहले एक सच्चा घटनाक्रम सुनाना चाहता हूं। तब फेसबुक जैसी सोशल साइटें जीवन का अभिन्न अंग नहीं हुआ करतीं थीं। ईमानदारी की चोचलेबाजी या विकास के मसीहागिरी की चोचलेबाजी या लच्छेदार स्वादिष्ट भाषणों या कुछ समय की न्यायिक हिरासतें या पुलिस की दो चार लाठियाँ आदि किस्म की आम आदमी द्वारा झेली जाने वाली सामान्य व रोजमर्रा वाली घटनाएं रातोंरात राष्ट्रीय नेता व देश के परिवर्तन का कर्णधार नहीं बनाया करतीं थीं। उसी समय की बात है।

भारत देश में एक राज्य है उसका नाम है केरल। उसी केरल राज्य की एक गांव की ग्राम सभा ने दुनिया में पेयपदार्थों की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक की नाक में नकेल कसने व अपने गांव का भूलज व कृषि अर्थव्यवस्था बचाने के लिए उस कंपनी द्वारा उस गांव में स्थापित व संचालित बाटलिंग प्लांट बंद कराने का प्रस्ताव पारित किया।

उस कंपनी ने ग्राम सभा के इस प्रस्ताव को केरल राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक बेंच ने अपने बयान में कहा कि ग्रामसभा को ऐसे प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, पानी सामाजिक संपत्ति है।

फिर क्या था, भारत में आंदोलनों के लिए बने विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के लोग, मैगसेसे पुरस्कृत कुछ लोग, फंडेड NGO वाले लोग आदि ने हाईकोर्ट की बेंच की उस बयान की कापियां निकलवाईं, उनके दस्तावेज बनाए, बुकलेट बनवाईं और देश भर में घूम घूम कर खूब बांटा। खूब प्रेस कांफ्रेस कीं। लग रहा था जैसे कि भारत में अब सामाजिक स्वामित्व सुदृढ़ हो जाएगा।

इन लोगों ने हजारों प्रेस कांफ्रेस की होगीं, जहां जाते वहीं प्रेस कांफ्रेस करते और हाईकोर्ट की भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात करते, चिल्ला चिल्ला कर हाईकोर्ट के शान में कसीदे पढ़ते।

इन सभी क्रियाकलापों से एक घटना हुई कि लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गया कि कोर्ट हमेशा सही व समाज के लिए कल्याणकारी निर्णय देता है। कोर्ट पानी को सामाजिक संपत्ति मानता है। कोर्ट ग्रामसभा व ग्रामीण लोगों के प्रस्तावों का आदर देता है, महत्व देता है। दिलोदिमाग में यह सब बैठाया सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न संगठनों के लोगों ने, मैगसेसे पुरस्कार पाने वालों आदि ने वह भी जागरूकता व चेतनशीलता आदि के नाम पर।

अब देखते हैं आगे की घटना-

लगभग एक या दो साल या कम ज्यादा समय के बाद केरल की उसी हाईकोर्ट ने अपनी बात पलट दिया।

सामाजिक आंदोलनों के संगठनों के लोग, NGO  वाले लोग, मैगसेसे पुरस्कृत लोग आदि तो देश भर में यह बता चुके थे कि पानी सामाजिक संपत्ति है और ऐसा हाईकोर्ट कहता है। देश भर में घूम घूम कर लाखों करोड़ों लोगों के दिलोदिमाग में बहुत कुछ बैठा चुके थे। उसी कोर्ट ने अपनी बात बिलकुल पलट दिया।

अब ये लोग जो लोगों के सामने ढेरों बातें दावे से ठोंकते हुए कर चुके थे। फिर से कैसे जाते उतने व उन्हीं लोगों के बीच यह कहने कि कोर्ट का निर्णय उचित नहीं, समाज के लिए कल्याणकारी नहीं। मान लीजिए यदि उन्हीं व उतने ही लोगों के पास किसी तरह जाना संभव भी होता तो भी लोग इनकी विरोधाभासी बातों पर विश्वास क्यों करते?

केरल के गांव की घटना जो भारत में भूजल के सामाजिक स्वामित्व के मसले पर बहुत बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन का आधार बन सकती थो। उसकी बिना सोचे बिचारे तात्कालिक लाभ के लिए की जाने वाले क्रियाकलापों के कारण भ्रूण हत्या हो गई।

लोगों के NGO को मिलने वाली ग्राँटों की राशि बढ़ गई, लोगों के नाम व पहचान बढ़ गई, लोग देश विदेश घूम लिए, लोगों सेलिब्रिटी बन गए, बहुत सारे पुरस्कारों का आदान प्रदान हो गया, लोगों को क्रांतिकारी होने का तमगा मिल गया।

लेकिन आम समाज वहीं का वहीं रहा या यूं कहें कि भूजल पर सामाजिक स्वामित्व वाला मसला पीछे चला गया। अब कोई न तो केरल के गांव की बात करता है न ही भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात होती है।

भारत में फेसबुक जैसी साइटों के आने से एक बात हुई है कि हम रातोंरात किसी को भी छुटपुट, टटपुंजिया, तात्कालिक व प्रायोजित घटनाओं के कारण सामाजिक बदलाव व परिवर्तन का मसीहा मान लेते हैं। सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन का नेतृत्व मान कर अपना समर्पण दे देते हैं, हममें से बहुत लोग अंध भक्त भी बन जाते हैं जो कुछ भी सुनने समझने तक को तैयार नहीं होते।

पता नहीं क्यों हम किसी तात्कालिक व अस्थाई लाभ के लिए परिवर्तनकारी नेतृत्वों के प्रायोजन में जुट पड़ते हैं, स्वयं को अंध समर्पित भी कर देते हैं। फिर कहते हैं कि दगा हो गया, समझ नहीं पाए।

दरअसल सामाजिक प्रतिबद्धता व जीवन मूल्यों को लेकर जितने सतही व खोखले हम होते हैं। हमारी कल्पना का परिवर्तन भी उतना ही सतही व खोखला होता है। यही कारण होता है कि हम सतही व खोखले आधारों पर परिवर्तन के लिए प्रायोजित नेतृत्वों के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं।

जिनको हम प्रायोजित करते हैं उनकी तो मौज हो जाती है, लेकिन हम व हमारा देश वहीं का वहीं खड़ा रहता है या पीछे चला जाता है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब हम चिल्लाते हैं कि खेत नहीं बचा पाए। लेकिन हम फिर वही गलती करते हैं, नई चिड़ियों पर विश्वास करते हैं, जो हमारे खेत फिर से चुगती हैं। हम फिर से ठगा महसूस करते हैं। कसमें खाते हैं मूर्ख न बनने की। लेकिन फिर हम नए प्रयोजनों में फंस कर नए बहाने व तर्कों को गढ़ने लगते हैं और फिर से ठगे जाते हैं। 

भारत में पिछले कुछ वर्षों में मीडिया व सोशल साइट्स के द्वारा बहुत ही कम समय में कई परिवर्तनकारी नेतृत्वों को विभिन्न घटनाओं को आधार बना कर तेज गति से प्रायोजित किया गया है। उनको बिना सवाल सत्ताएं भी सौपी गईं लेकिन उनका वास्तविक चरित्र क्या रहा यह बाद में मालूम पड़ा और लोगों ने ठगा महसूस किया।

कितनी बार हम मूर्ख बनेंगे कब तक ऐसा करते रहेंगे। हमें शार्ट कट बंद करने होगें। हमें बिना खुद को बदले हुए परिवर्तन देखने की लिप्सा से ऊपर उठना होगा।

पहले हमको समझदार बनना होगा, प्रवंचना कभी भी अपने लिए समझदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती। बेईमानी कभी भी अपने लिए ईमानदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती।

सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता।

हमें ठोस होने की जरूरत है और हमें परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक रास्तों को चुनने की जरूरत है। वास्तविक सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन कभी भी शार्टकट व टटपुंजिए तौर तरीकों से संभव नहीं।

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विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
“सामाजिक यायावर”
* लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
* मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
* संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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