मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार

मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर
साभार –
पृष्ठ संख्या  242 से 245 

मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए  भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है।

मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं।
नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के बाबा, ऊंचे वेतन वाले नौकरीपेशा व नौकरशाहों के बाबा आदि।

मित्र : भारत में इतने बाबा लोग क्यों हैं
नोमेड : इसका कारण भारत में मानव-निर्मित ईश्वर के प्रतिनिधियों की बहुत बड़ी संख्या का होना है। चूंकि परंपरा में मानव-निर्मित ईश्वर की अवधारणा में यह मान लिया गया है; कि ईश्वर जादू से समस्या हल कर देता है, ईश्वर जादू से मानवीय स्वार्थ की इच्छायें पूरी कर देता है, ईश्वर जादू से भोगविलास व ऐशोआराम की इच्छायें पूरी कर देता है। सारांश यह कि ईश्वर का काम मनुष्य को भोग-विलास करवाना है, जो ईश्वर भोग करवा दे वह महान् व शक्तिशाली, जो न भोग करवा पाएउस पर आस्था खतम करके दूसरे प्रकार के ईश्वर में आस्था रखना। 

भारतीय समाज में परंपरा में लोगों के मन में यह धार्मिक अनुकूलन बनाया गया है कि कुछ लोग ईश्वर से संपर्क रख सकते हैं, ईश्वर से संवाद कर सकते हैं, ईश्वर से सिद्धियां सीख सकते हैं, ईश्वर को मानव की इच्छा पूर्ति के लिए प्रसन्न कर सकते हैं और मुंहमांगा वरदान प्राप्त कर सकते हैं आदि आदि।

मित्र :  मैं ठीक से समझा नहीं।
नोमेड : लड़का पैदा करना हो, लड़की न पैदा करना हो, छोटे बच्चे से लेकर ऊंचे वेतनमान की परीक्षा तक किसी में भी सफलता प्राप्त करनी हो, सुंदर पत्नी प्राप्त करनी हो, कमाऊ पति प्राप्त करना हो, बीमारी का इलाज करना हो, दुश्मन को क्षति पहुंचानी हो, नौकरी प्राप्त करनी हो, प्रमोशन प्राप्त करना हो, किराएपर मकान लेना हो, मकान के लिए किरायेदार मिलना हो, पति को दुरुस्त करना हो, पत्नी को दुरुस्त करना हो, बेईमानी करके उसको महानता में बदलना हो, काली करतूतों को सफेद करना हो, पाप करके किएगएपाप को पुण्य में परिवर्तित करना हो आदि आदि अनेकों प्रकार के चिल्लर कामकाज व आवश्यकतायें हैं। जिनके लिए लोगों को ईश्वरीय प्रतिनिधियों की आवश्यकता पड़ती है। भारत के लोगों की सहज मानसिकता है कि पुरुषार्थ के बजाय, काम कराने के लिए संपर्क व संबंध खोजते हैं। और ऐसी मानसिकता का कारक भी परंपरा में ईश्वरीय प्रतिनिधियों का प्रायोजित होना ही है।

मित्र : इसका बाबा लोग से क्या रिश्ता है।
नोमेड : बहुत गहरा रिश्ता है। भारत में परंपरा में ऐसा धार्मिक अनुकूलन किया गया है कि कुछ लोग ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं जिनके माध्यम से ईश्वर मनुष्यों के साथ संपर्क रखते हैं। इन प्रतिनिधियों को बिना किसी भी शंका के पूरे समर्पण के साथ स्वीकारना है और इनके प्रति सेवा व समर्पण का भाव रखना है।

मनुष्य हर उस तंत्र का मानसिक व वैचारिक अनुगामी होना स्वीकार कर लेता है, जो उसकी ऐश्वर्य, सुविधा व भोग-विलास की इच्छा की पूर्ति कराने का दावा करता है। तो जिन लोगों ईश्वर के साथ संपर्क रखने वाला प्रायोजित कर दिया जाता है, लोभी, मृत्यु व मृत्यु के पश्चात् नर्क की प्रताड़नाओं से भयभीत लोग उनको अपना गुरू स्वीकार कर लेते हैं, उनको पवित्र व पूजनीय मान लेते हैं ताकि उनके माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर सकें और आकाशीय-स्वर्ग या भू-स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकें।

मित्र : गुरू को तो बहुत महान् माना जाता है।
नोमेड : इसी मान्यता व अनुकूलन का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपने अनुयायी बनाते हैं और अनुयायियों में अपने प्रति बिना मूल्यांकन व विश्लेषण के अंधी आस्था पैदा व विकसित करते हैं, जिसके समक्ष कोई भी उचित तर्क व कारक आदि सभी व्यर्थ है, कूड़ा है, मिट्टी है, अस्तित्वहीन हैं, अप्रासांगिक हैं।

पारंपरिक धार्मिक अनुकूलन में गुरू को सबसे अधिक महान् बताया गया है। इस मूल्य का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपनी गुरूता पर अंधी आस्था रखने का अनुकूलन स्थापित करते हैं और बिना शंका अंधी आस्था कायम रखने के लिए गुरू संपूर्ण है, ईश्वरीय चेतना से संपन्न है, ईश्वर की सक्रियता व अभिव्यक्ति का अंश है इसलिए  शिष्य कभी गुरू से आगे नहीं जा सकता है आदि आदि गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में प्रायोजित करते हैं।। शिष्य द्वारा गुरू पर शंका करना अक्षम्य अपराध है, इस अपराध के लिए गुरू को शिष्य को घोर से घोर दंड देने का अधिकार है। शिष्य को गुरू का मानसिक व शारीरिक दास बनना होता है।

मित्र : आप कहना चाहते हैं कि लोगों के मन में बैठी ऐसी परंपरागत सामाजिक व धार्मिक अनुकूलन का लाभ उठाने वाले बाजारू बाबा लोग हैं।
नोमेड : जी बिलकुल। बाजारू बाबा लोग बड़े चतुर हैं, भलीभांति समझते हैं कि भारतीय समाज के लोग धर्मभीरु हैं और स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना पुरुषार्थ का शार्टकट खोजते हैं। और लोगों के लिए ईश्वर का मतलब जादू करके मनुष्य की भोगने की इच्छाओं की पूर्ति कराने वाला है।

इसलिए  जो मृत्यु के निकट नहीं हैं वे और अधिक सांसारिक भोगों के लिये; जो मृत्यु के निकट हैं वे जीवन भर किएगएस्वार्थ के कामों, हिंसा व पापों की जवाबदेही से बचकर स्वर्ग में ऐश्वर्य भोगने के जुगाड़ के लिये; बाबाओं रूपी ईश्वरीय प्रतिनिधियों के अनुगामी बनते हैं।

मित्र : जुगाड के लिए क्या करना होता है।
नोमेड : जुगाड़ के लिए कुछ विशेष नहीं करना होता है। अलग-अलग बाबा अपना अलग तरीका लेकर चलता है ताकि अनुयायियों के अंदर गुरू की अद्वितीयता का अहसास भी हो और कर्मकांड करना बहुत दुष्कर भी न हो। इसलिए  किसी पशु को कुछ खिलाना/नहलाना/पानी-पिलाना या किसी को दान करना आदि आदि; किसी रंग का कपड़ा पहनना या दान करनाआदि आदि; किसी दिन कुछ करना या न करना आदि आदि;  माता पिता या बड़े-बूढ़ों के दिन में कई बार पैर छू लो या रात में किसी विशेष समय जग कर पैर छू लो आदि आदि, इससे माता पिता और बड़े बूढ़े भी गुरु जी के ऊपर प्रसन्न हो गएऔर उनका गुरू जी का प्रचार भी हो गया। इसी प्रकार का कुछ ऊटपटांग करना व करवाना और तर्को से किएजा रहे कर्मकांड का संबंध दैवीय प्रयोजन से सिद्ध कर देना। 

आजकल तो आध्यात्मिक बाबा लोग का फैशन आ गया है। जागरूक व पढ़ेलिखे लोग अपने लिए अलग प्रकार के आध्यात्मिक बाबा लोग चाहते हैं। एबाबा लोग इन लोगों को जीने का तरीका सिखाते हैं, व्यवहार करना सिखाते हैं, शांति सिखाते हैं, बाकायदा कोर्स कराते हैं, कोर्स की फीस लेते हैं। फीस लेना प्रोफेशनल्स को बाबा का प्रोफेशनल, ईमानदार व वजनदार होना सिद्ध करता है।

पैसे कमाने और ग्लैमर भोगने के लिए बेइंतहा दौड़-भाग करते ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल्स लोग जब कभी अपने बाजारूपन से अलग हटकर कुछ सोचते हैं तो उनको अंदर से भय, असुरक्षा, घुटन व कुंठा आदि महसूसती है। तो इससे पलायन करने के लिए ये लोग अपने लिए किसी को अपना आध्यात्मिक गुरू मान लेते हैं और फिर गुरू के बताई पद्धतियों के नशे में छद्म शांति महसूसते हुए पूर्ववत जीवन जीने लगते हैं।

उपभोक्ता रूपी मनुष्य की हर वास्तविक/संभावित/आभासी आवश्यकता के लिए विकल्प प्रस्तुत कर देना ही, बाजार के तंत्र की सफलता व मजबूती है। बाजार में उपलब्ध आध्यात्मिक व गैर-आध्यात्मिक बाबा लोग भी ऐसे ही बाजारू विकल्प हैं। किसी ने लोगों से किसी बाबा के बारे में सुना, अपनी तथाकथित मूल्यांकन क्षमता व बौद्धिकता आदि से बाबा को तौला और पसंद आने पर उस बाबा को गुरू मान लिया।  व्यक्ति को अपनी पसंद का गुरू बाजार में उपलब्ध है।

मित्र : इन बाबाओं के पास इतना पैसा कहा से आता है।
नोमेड : बाबा लोगों के पास मुख्यतः दो प्रकार के लोगों के द्वारा पैसा अधिक आता है। व्यापारी व व्यापारियों के परिवारों से और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, नौकरशाहों व उनके परिवारों से।

मित्र : ऐसा क्यों, व्यापारियों की बात तो समझ आती है लेकिन नौकरशाह व प्रोफेशनल्स …… अचरज की बात है।
नोमेड : ऐसा इसलिए  कि व्यापारियों के बाद सबसे अधिक असंतुष्ट, भ्रमित व अनैतिक लोग एही लोग हैं। इन लोगों का भ्रम, अनैतिकता व अर्थ की ताकत का अहंकार इनको अंदर की शांति नहीं प्राप्त करने देते हैं। दूसरों की तुलना में पैसा अधिक होने से अहंकार का स्तर बहुत ही ऊंचा होने के कारण ये लोग अंदर की ईमानदारी के साथ सामाजिक भी नहीं हो पाते। बाबाओं का चेला बनने से, दूसरे चेलों के साथ तथाकथित सामाजिकता का ढोंग भी जीने को मिल जाता है।

भारत में अमूमन व्यापारी वर्ग गैर पढ़ा लिखा होता है, इसलिए इनके धार्मिक बाबा लोग पढ़े-लिखे लोगों के बौद्धिक श्रेष्ठता के अहांकारों को नहीं सुहाते हैं। इसलिए पढे-लिखे व स्वयंभू जागरूक लोगों ने अपने लिए अलग किस्म के बाबा बना लिए हैं, जिनको ये लोग आध्यात्मिक बाबा कहना पसंद करते हैं, जो इनके तार्किक अहंकारों को तर्कों से तुष्ट करते हुएबाबागिरी करते हैं।

भारत में धार्मिक व आध्यात्मिक बाबागिरी बहुत बड़ा व ताकतवर उद्योग बन चुका है। ये लोग बाकायदा विभिन्न सत्ताओं जैसे बाजार व राजनैतिक सत्ताओं आदि के एजेंट की तरह भी काम करते हैं और अपने वेतनभोगी कर्मचारी भी रखते हैं। प्रचार कंपनियों से अपना प्रचार भी करवाते हैं और लाभ कमाते और कमवाते हैं। उद्योग बनने का एक कारण “आस्तिक व नास्तिक” की भ्रामक परिभाषाओं का प्रचलन भी है।

मित्र : आप आस्तिक या नास्तिक किसे कहते हैं।
नोमेड : बात मेरे कहने की नहीं है। बात आस्तिक व नास्तिक शब्दों के शाब्दिक अर्थ व किस संदर्भ में प्रयोग करने के लिए ये दोनों शब्द बनाए गए। इन शब्दों की शुरुआत होने का मत यह भी है कि वेदों को मानने वाला आस्तिक व वेदों को न मानने वाला नास्तिक है।

यदि शाब्दिक अर्थ में जाएं तो इनका अर्थ कुछ यूँ निकलता है। आस्तिक = “जो है” उस पर विश्वास करने वाला और नास्तिक = “जो नहीं है” उस पर विश्वास करने वाला।

मानव-निर्मित ईश्वर तो मानव का गढा हुआ है, इसलिए मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करने का तात्पर्य “जो नहीं है” उस पर विश्वास करना हुआ। जो मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे भयंकर रूप से ‘नास्तिक’ होते हैं, वह भी जबरदस्त अहंकार व हिंसक भावना से ओतप्रोत क्योंकि ये लोग ईश्वर को मनमाफिक गढ़ते हैं। जो निर्विकार अस्तित्व पर विश्वास करता है केवल वही “आस्तिक” है, क्योंकि वह “जो है” उस पर विश्वास करता है।

लोग यदि इन दो शब्दों का अर्थ ही समझ लें तो जो बाबा लोग ढोंगी हैं, तो ऐसे बाबाओं के छद्म-जालों की मानसिक व वैचारिक दासताओं के चंगुल से बाहर निकलने की संभावना बनी रहती है।

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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