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हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

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सामाजिक यायावर

यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो।

मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले तर्को/तथ्यों, निहित स्वार्थों/पूर्वाग्रहों व राजनैतिक पूर्वाग्रहों/संरेखणों आदि के आधार पर न लिखूं। संभवतः यही कारण है कि सोशल साइट्स में विचारशील व सामाजिक दृष्टिवान लोग ही मुझे पढ़ते हैं और मेरा लिखा पसंद करते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हो चुका है कि मेरी बातों की गहराई लंबे समय बाद समझी गई है और स्वीकृत की गई है। यहां तक कि मेरे जमीनी कामों के प्रमुख साथियों को भी मेरी बातों को समझने में कई-कई वर्ष कभी कभी पांच से दस वर्ष तक भी लग गए हैं।

मैं सन् 2013 से सन् 2015 तक कई बार भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी, बनारस को क्योटो शहर बनाने जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लिख चुका हूं। आजकल कुछ पाठकों ने इन मुद्दों पर लिखे गए मेरे पुराने छोटे बड़े लेखों को खोज कर फिर से उन पर टिप्पणियां देना शुरू किया है। इसलिए स्मार्ट सिटी पर यह लेख-श्रंखला मित्रों को प्रस्तुत है।

हम भारतीयों की वर्तमान मानसिकता, सोच, समझ, कंडीशनिंग व जीवन शैली के आधार पर स्मार्ट सिटी कैसे हो सकते हैं। इस पर बात करने के पहले हम स्मार्ट सिटी क्यों चाहते हैं इसको समझने का प्रयास होना चाहिए।

दरअसल हम दिखावटी तौर पर कितना भी भारत व भारतीय संस्कृति की महानता का दावा ठोंकते रहें, कितना भी ड्रामेबाजी करते रहें लेकिन वास्तव में हमारे अंदर पाश्चात्य देशों व उनकी जीवन शैली ही आदर्श के रूप में स्थापित रहती है। हम मुंह से कुछ भी बोलते रहें लेकिन हम अपनी जीवन शैली में पाश्चात्य देशों की शैली का ही अनुकरण करते हैं व करना चाहते हैं।

हम रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों तक में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी स्मार्टनेस समझते हैं। हर शहर, हर कस्बे में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। हम अपने बच्चों को वहां  भेजते हुए फक्र महसूस करते हैं।हिंदी मीडियम स्कूलों की तुलना में कई गुना अधिक फीस भी देते हैं। हमारे बच्चे भी हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने वाले बच्चों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और उन बच्चों को हीन व हेय मानते हैं। ऐसी सोच हम खुद भी रखते हैं।

दरअसल हम रेडीमेड तरीके से स्मार्ट होना चाहते हैं, हम रेडीमेड तरीके से विकसित होना चाहते हैं। इसलिए बाजार जाते हैं और स्मार्ट बनने के रेडीमेड टोटके खोजते हैं। हम जींस व टीशर्ट पहनना शुरू कर देते हैं, सुपर मार्केट में सामान खरीदना शुरू कर देते हैं भले ही हमें जींस, टीशर्ट व सुपर मार्केट की कतई जरूरत न हो। हम अपने बच्चों को स्मार्ट करना चाहते हैं तो उनको रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भी महंगी से महंगी फीस भरकर भेजते हैं। लाखों रुपए सालाना डोनेशन देकर रद्दी इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में भेजते हैं, यदि ज्यादे रुपयों का जुगाड़ हो गया तो विदेशों में लाखों रुपए महीना फीस व खर्चों का इंतजाम करके बच्चों को डिग्री लेने के लिए भेजते हैं वह बात अलग है कि बच्चा डिग्री लेकर भी परजीवी की तरह ही रहता है। लेकिन हम तो खुद को अपने गली मुहल्ले में स्मार्ट साबित कर लेते हैं।

जो साधारण मोबाइल का प्रयोग करता है वह स्मार्ट नहीं है, जो आईफोन का प्रयोग करता है वह स्मार्ट है। जो लड़की जींस व टीशर्ट पहने वह स्मार्ट, जो लड़की सलवार कुर्ता दुपट्टा पहने वह दकियानूसी। जो टाई पहने वह स्मार्ट जो कुर्ता पायजामा पहने वह दकियानूसी। जो बियर पिए, वाइन पिए वह स्मार्ट जो अपने हाथ की बनाई महुआ की दारू पिए वह पिछड़ा व हीन। जो महंगी मोटरसाइकिल में चले वह स्मार्ट, जो साइकिल में चले या पैदल चले वह पिछड़ा, मूर्ख व हीन।

यही इसी प्रकार की बाजार से खरीदी जाने वाली सतही सड़कछाप स्मार्टनेस, सफलताएं, उपलब्धियां आदि ही हमारी जीवन शैली बन चुकी हैं, और हमारे जीवन का उद्देश्य व उपलब्धियां भी। हमारे अंदर इसी बाजारू स्मार्टनेस व इसके सतहीपन के कारण ही हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं। हम सबकुछ बाजार से रेडीमेड खरीदना चाहते हैं, हमारा सबकुछ बाजार से ही तय हो रहा है। बाजार से खरीदने के लिए हमें धन व संपत्ति चाहिए होता है। इसलिए धन व संपत्ति के लिए हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जाते हैं, सतही व खोखले होते चले जाते हैं।

हमारे अंदर आविष्कार, अनुसंधान व निर्माण करने की सोच व क्रियाशीलता नहीं होती, वास्तविक उद्यमशीलता नहीं होती है। होने की बात छोड़िए हम इन गुणों का तिरस्कार करते हैं, उपहास करते हैं। जैसे हम, वैसा हमारा समाज, वैसे हमारे व्यापारी व उद्योगपति, वैसे हमारे जन प्रतिनिधि, वैसे हमारे नौकरशाह और वैसे ही हमारे नीतिनिर्माता।

हमारे अंदर स्मार्ट सिटी के प्रति नशा इसलिए सवार है क्योंकि हम अपने अंदर पाश्चात्य देशों की तरह साफ सुथरे चमचमाते शहरों व जीवन शैली को रेडीमेड तरीके से जीना चाहते हैं। स्मार्ट सिटी के बारे में हमारी कल्पना है कि अचानक हमारे शहरों को अमेरिका का न्यूयार्क, इंग्लैंड का लंदन, फ्रांस का पेरिस, आस्ट्रेलिया का सिडनी बना दिया जाएगा। हमें लगता है कि ऐसे शहर बाजार से रेडीमेड खरीदे जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह जितनी कवायद हो रही है, वह बाजार से रेडीमेड स्मार्ट सिटी खरीद कर कहीं रख देने जैसी ही कवायद है। विश्वास कीजिए हमारे स्मार्ट सिटी भी सड़कछाप, सतही व टपोरी टाइप ही होगें।

इस लेख पर कुछ बात हुई हमारी अपनी स्मार्टनेस पर। हमारे प्रस्तावित स्मार्ट सिटीज पर बात श्रंखला की अगली कड़ी में। 

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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