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पंचायत चुनावों में पढ़ाई को अनिवार्य बनाना लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन

सामाजिक यायावर


साभार – http://panchayatkhabar.com

स्कूली पढ़ाई किसी व्यक्ति की समझदारी का मापदंड नहीं हो सकती है। निरक्षर व्यक्ति भी बहुत अधिक समझदार व बहुत बेहतर जनप्रतिनिधि हो सकता है। बहुत ऊंची डिग्रीधारी व्यक्ति भी बहुत धूर्त जनप्रतिनिधि हो सकता है। पंचायती चुनावों में ही नहीं किसी भी प्रकार के जनभागीदारी वाले चुनावों में देश के हर आदमी को चुनाव लड़ने का हक वैसे ही होना चाहिए जैसे कि देश के हर आदमी को मतदान देने का हक है।स्कूली शिक्षा को बहुत अधिक तरजीह देने जैसी मूर्खता या अहंकार करने का सामाजिक दंश देश के लोगों को देने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है।

लोग स्कूल जा रहे हैं, समय के साथ साथ अपने आप सभी साक्षर लोग ही चुनाव लड़ेगें। यदि किसी क्षेत्र के लोग किसी अनपढ़ को अपना जन प्रतिनिधि नहीं देखना चाहते हैं तो उनके पास अनपढ़ व्यक्ति को मतदान न करने का विकल्प सुरक्षित है। यह लोगों को तय करने दीजिए कि उन्हें अपना जन प्रतिनिधि निरक्षर चाहिए या साक्षर, ऐसा करने का उनके पास अधिकार भी है। या फिर देश के लोगो से मतदान का अधिकार भी हड़प कर लीजिए।

भारत देश को चलाने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व नौकरशाह ही हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर कार्यकारी अधिकार इन्हीं लोगों के पास होते हैं। ये लोग पढ़े लिखे होते हैं, ऐसा माना जाता है कि बहुत ही अधिक कठिन परीक्षाओं को पार करके नौकरी पाते हैं। फिर भी इनमें से अधिकतर लोगों ने देश व समाज की हालात खराब कर रखी है, भ्रष्टाचार को समाज व जीवन का मूलभूत अंग बना दिया है। पूरी चालाकी के साथ हर बात का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ देते हैं जबकि सारे कार्यकारी अधिकार इन्हीं सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के पास होते हैं।

देश के किसी विभाग की बात कीजिए, सभी में खूब पढ़े लिखे लोग नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे हैं। लेकिन सामंती अधिकार, अनापशनाप वेतन व सुविधाओं को भोगने के बावजूद ये पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी व अधिकारी देश के लोगों के प्रति न तो संवेदनशील होते हैं और न ही जिम्मेदार होते हैं।

नदियों को मार दिया है, प्रदूषण की भयंकर हालत कर रखी है, हर स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को बाजारू बना दिया है। गांवों को घटिया, पिछड़ा व अजागरूक बता कर खतम करने का कुचक्र रचा गया है। अब ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए पंचायती चुनावों को लड़ने के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है।

पहले इस बात पर इमानदारी से खुली चर्चा तो की जाए कि पढ़े लिखों ने देश को क्या दिया और गांव के गवांरो ने देश को क्या दिया है। यदि ईमानदारी से चर्चा की जाएगी तो बिलकुल साफ दिखेगा कि गांव के गवारों ने देश को बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि पढ़े लिखों व शहरी लोगों की जरूरतों की पूर्ति का आधार भी गांव व गवांर ही हैं।

उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश पर रोक लगाने के लिए संसद को चर्चा करनी चाहिए। कानून संसद बनाती है। देश का संविधान उच्चतम न्यायालय ने नहीं बनाया है। देश  के मालिक व दिशा निर्देशक देश के आम लोग हैं न कि कोई सरकार या कोई न्यायालय। संरकार और संसद को जनहित में निर्णय लेना चाहिए।

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