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‘लोकतंत्र’, ‘साहब’, ‘जनलोकपाल’ और ‘बेरोकटोक-सत्ता-भोग’ की महात्वाकांक्षा

सामाजिक यायावर

‘मेरी समझ में कुछ बातें नहीं आती हैं जैसे कि साहब यदि सच में ही ‘जनलोकपाल’ बिल लाना चाहते हैं तो लोकतंत्र का आदर क्यों नहीं करते हैं। इनके इस दावे का कि इनके अलावे बाकी सब लुच्चे लफंगें है और केवल इनकी ही पार्टी के लोग शुद्ध-बुद्ध हैं इसलिये देश की जनता को इनको पूर्ण बहुमत देना चाहिये ताकि साहब ‘जनलोकपाल’ कानून बना पावें……. में बहुत ही बेसिक नुक्श हैं, जिनकी चर्चा ‘साहब’ कभी नहीं करते हैं।

भारत के संविधान के अनुसार तो ‘साहब’ को ‘जनलोकपाल’ कानून बनानें के लिये 362 सांसद लोकसभा में और 160 सांसद राज्यसभा में चाहिये। जो कि साहब की पार्टी केवल अपनें दम पर ले आयेगी ऐसा साहब जी के जीते जी हो पायेगा ऐसा लगता नहीं है क्योंकि 2014 इनकी पार्टी का सबसे स्वर्णिम अवसर है और इस बार इनकी पार्टी चुनाव ही लड़ रही है कुल 350 सीटों में, यदि साहब की पार्टी सभी 350 सीटों में जीत जाती है तब भी लोकसभा में 12 लोग और और राज्यसभा में 160 सांसद कहां से लायेंगें।

अब सवाल यह उठता है कि जब साहब अपनें दम पर ‘जनलोकपाल’ कानून बना ही नहीं सकते हैं तो क्या यह सब धींगामुस्ती खुद के लिये बेरोकटोक सत्ता का भोग करनें के लिये ही है…….

पता नहीं क्यों ‘साहब’ की अधिकतर बातें, दावे और तर्क बिलकुल ही हजम नहीं हो पाते हैं और थोड़ी सी ही गवईं-अकल लगाते ही बातों के बताशों की तरह ढेर हो जाते हैं।

‘साहब’ जिस लोकतंत्र को रोज गलियाते हैं, उसी लोकतंत्र नें सिर्फ ‘साहब’ की हवाई बातों और दावों पर विश्वास करके सत्ता सौंप दी।

‘साहब’ को अपनीं खुद की राजनैतिक महात्वाकांक्षा से बाहर निकलकर सच में ही देश, देश के असल व बहुसंख्य समाज और देश के लोकतंत्र का आदर करना सीखना चाहिये।

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