आदरणीय मित्रों से एक सविनय निवेदन : गंभीर लेखों के मसले पर

0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningआदरणीय मित्रों,

सादर प्रणाम

 

आपके प्रेम, आपकी सक्रिय भागीदारी और मेरा उत्सावर्धन करते रहनें के लिये मैं आपका हार्दिक आभारी हूं। गंभीर लेखों के संदर्भ में मैं आप सुधिजनों के समक्ष अपना सविनय निवेदन रखना चाहता हूं, आप मेरे निवेदन पर विचार करनें की कृपा कीजिये। सादर 

 

मैं एक मान्यता प्राप्त प्रोफेशनल जर्नलिस्ट हूं, कुछ छोटी मोटी प्रिंट व आनलाइन पत्रिकाओं का संपादक भी हूं जिसमें कि एक 120 पृष्ठ की मल्टीकलर अंग्रेजी भाषा की प्रिंट जरनल भी है जो कि गंभीर सामाजिक मसलों में गंभीर लेख व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रकाशित करती है। 

 

मेरी चंद रिपोर्ट्स दुनिया की प्रतिष्ठित प्रिंट-जर्नल्स में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। मैंने UN, UNICEF, EU जैसी वैश्विक संस्थाओं को उनके कुछ वैश्विक-दस्तावेजो को बनानें में एक जर्नलिस्ट के रूप में सहयोग भी किया है और उनके द्वारा मुझे सम्मानजनक तरीके से धन्यवाद भी ज्ञापित किया गया है। 

 

मेरे पास एक जर्नलिस्ट/संपादक के रूप में बस यही कुछ चंद छोटे मोटे अनुभव हैं और कुछ खास नहीं। मैं अभी सीख रहा हूं और संभवतः आजीवन सीखूंगा। मैं आभारी हूं जो कि आपमें से बहुत मित्रों से समय समय पर बहुत कुछ सीखनें को मिलता रहता है। 

 

मैं आपसे कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। कुछ ऐसी बातें हैं जो कि मुझे आपसे कुछ और सीख पानें से हतोत्साहित करतीं हैं। कुछ मसले हैं जिनको कि मैं आपके समक्ष सादर प्रेषित करना चाहता हूं ताकि आपसे और बेहतर सीख पानें में मुझे हतोत्साहन नहीं महसूस हो। सादर

 

मेरी अधकचरी समझ के अनुसार-

 

लंबे व गंभीर लेख लिखना टीवी-चैनल्स की बाइट्स, अखबारों की हेडलाइन्स और मैगजीन्स की सुर्खियां पढ़कर/देखकर प्रतिक्रियास्वरूप चंद लाइनें लिखनें जैसा या बाइट्स लिखनें जैसा नहीं होता है या अखबारी खबर लिखनें जैसा भी नहीं होता है जिसमें घटना की सूचना भर दे देनी होती है या खबरों की हेडलाइन आदि का लिखना जैसा भी नहीं होता है। 

 

लंबे व गंभीर लेख, लेखक लिखनें के पहले सोचता है, विचारता है, अध्ययन करता है, तथ्यों की पड़ताल करता है …. फिर लिख पाता है। जो नये लेखक होते हैं उनको लिखनें में बहुत समय लगता है, किंतु जो लोग लंबे समय से लिख रहे होते हैं उनके अंदर हरसमय कुछ न कुछ चिंतन/आब्जरवेशन चलता रहता है सो लिखना तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम समय में हो जाता है। 

 

मेरा सविनय निवेदन जो कि मेरी अधकचरी समझ के ऊपर आधारित हैं:

  • लेख/पोस्ट का मूल विषय लेख/पोस्ट होता है न कि लेख/पोस्ट में की गयी कमेंट्स:
    आपमें से कई लोग कमेंट्स में केवल यह बतानें के लिये आते हैं कि पोस्ट का विषय क्या होना चाहिये था और अपनी कमेंट्स से मुझ पर लेख/पोस्ट के मूल-विषय को बदलनें का दबाव भी डालते हैं और लगातार बहस करते हैं। और यदि मैं उनका दबाव नहीं स्वीकारता हूं तो मुझे अहंकारी/शंखनादी आदि आदि जैसी सांस्कृतिक-गालियों से सुशोभित करते हैं।

    चूंकि आप मेरे मित्र हैं, इसलिये मेरी अधकचरी समझ का आदर करना सीखिये। मैं आपकी पोस्ट में आकर आपसे कभी नहीं कहता कि आपको क्या लिखना या क्या नहीं लिखना चाहिये …. आप भी मेरे लेखों/पोस्टों में मुझे यह न बताईये कि मुझे क्या लिखना चाहिये था।

    यदि आपको लगता है कि मेरी अधकचरी समझ बेहतर नहीं है तो आप खुद लेख/पोस्ट लिखिये ताकि मुझे भी आपसे सीखकर परिष्कृत होनें का अवसर मिल सके।

  • आप मेरे मित्र होनें के नाते या मेरे पाठक होनें के नाते मुझे किसी विषय में लेख/पोस्ट लिखनें का आदेश दे सकते हैं। और यदि मुझे उस विषय की जानकारी होगी तो मैं आपका आदेश सिर-माथे रखूंगा।
    किंतु आप जब लिखे जा चुके लेख/पोस्ट के मूल-विषय में ही प्रश्न खड़ा करते हैं तो यह आपका मुझे गाली ही देना होता है और कुछ भी नहीं। भले ही आपकी भाषा कितनी भी संतुलित क्यूं न हो। 
     
  • रचनात्मकता, रचना और रचनाकार का आदर करना भी मानवीय संवेदनशीलता का आधारभूत जीवन-मूल्य है।
    मूल-विषय के बिंदुओं में सहमति/असहमति हो सकती हैं और ऐसा होना प्रशंसनीय है किंतु मूल-विषय के औचित्य को ही नकारनें का मतलब आप रचनाकार और रचना को गाली दे रहे हैं और खुद के अहंकार को पोषित कर रहे हैं, और अपनें अहंकार के कारण दूसरों पर मानसिक हिंसा भी कर रहे हैं।
     

जिस प्रकार के लेखों को लोग पैसे लेकर लिखते हैं उस गुणवत्ता के लेखों को मैं बिना किसी आर्थिक लाभ के लिखता हूं और कापी-राइट के बिना ऐसे ही खुला छोड़ देता हूं। जबकि कई लोग मेरे लेखों को अपनें नाम से लिख रहे हैं और बेच रहे हैं वह भी चंद पंक्तियों में कुछ हेरफेर करके, और इस श्रेणी में आने वाले लोग वे हैं जो टीपते तो मेरे लेख हैं किंतु आजतक कभी मेरे लेखों में न तो "लाइक" किये और न ही "कमेंट"। ऐसे लोगों का चरित्र का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है। मुझे इन लोगों के इस प्रकार के अनैतिक-चरित्र से कोई तकलीफ नहीं है क्योंकि मेरे लिये सामाजिक-चेतना व जागरूकता महत्वपूर्ण है न कि मेरा नाम। 

दुर्भाग्य से मैं 1992 से सामाजिक सरोकारों में प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हूं, इसलिये मेरे लिये लेखन का लक्ष्य "लाइक" "कमेंट" "सस्ती लोकप्रियता" या "आर्थिक लाभ" आदि नहीं ही है। यदि मुझे एक भी लाइक न मिले, एक भी कमेंट न मिले तब भी मैं लिखता रहूंगा। लिखना मेरे लिये सामाजिक-प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

सादर प्रणाम
विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

Leave a comment: