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हिंदू धर्म की आधारभूत कथित-कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था का आधुनिक काल्पनिक-चित्रण

सामाजिक यायावर

यह लेख उन लोगों के लिये लाभदायक हो सकता है, जो कि जातिवाद के घोर हिमायती हैं और इस गुमान में जीते हैं कि जातिवाद वास्तव में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था है। जिन लोगों का जाति-विरोध केवल चुनावी-राजनीतिक व आरक्षण जैसे मसलों में होनें वाली हानि के स्वार्थ पर आधारित है, कृपया वे खुद को जातिवाद का घोर हिमायती ही मानकर इस लेख का आनंद उठावें।

यदि आप यह मानते हैं कि भारत के लिये जाति वास्तव में ही आधारभूत जरूरी है। यदि जाति-व्यवस्था बहुत ही नायाब खोज थी और वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म की ही अति-मानवीय व सामाजिक-व्यवस्था है।  और समय के साथ वर्ण-व्यवस्था को यदि चौपट नहीं किया गया होता तो यह बहुत ही लाजवाब व्यवस्था थी।

तो आप नीचें की काल्पनिक-चित्रण को समझिये और सच में अंदर से इमानदार होकर बहुत ही साधारण भी तार्किक क्षमता का प्रयोग करके स्वयं में जातिवाद से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजनें की सामाजिक-इमानदार चेष्टा कीजिये।

वर्ण-व्यवस्था सच में ही जन्म-आधारित न होकर कर्म-आधारित थी तो आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था किस प्रकार की हो सकती है, इसका काल्पनिक-चित्रण का प्रयास किया जाये।

यदि ध्यान से देखा जाये तो जिस कर्म को वर्ण तय करनें का आधार माना गया था वह कोई गूढ़ कर्म न होकर व्यवसाय के चरित्र पर आधारित था।  इसलिये मैंने व्यवसाय को कर्म मानते हुये आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था की कुछ-कुछ कल्पना की, जो कि कुछ यूं है-

ब्राम्हण वर्ण:

  • वैज्ञानिक
  • प्रोफेसर
  • शिक्षक
  • ट्यूटर
  • अवैतनिक सामाजिक-कार्यकर्ता
  • सामाजिक-शोधार्थी
  • संपादक
  • जर्नलिस्ट
  • चिकित्सक
  • …. आदि आदि

क्षत्रिय वर्ण:

  • सांसद/विधायक
  • सेना में काम करनें वाले लोग
  • पुलिस में काम करनें वाले लोग
  • …… आदि आदि

वैश्य वर्ण:

  • नौकरशाह
  • कंपनीज के निदेशक/मुख्य-कार्यकारी अधिकारी आदि
  • प्रबंधक
  • मार्केटिंग विभाग
  • व्यापारी (गांव में सड़क किनारे कपड़ा बिछाकर पान-मसाला बेचनें वाले से लेकर सुपर-मार्केट तक)
  • व्यापाराना डीलों के दलाल
  • शेयर-बाजार के दलाल
  • राजनीति में दलाल किस्म के लोग
  • मीडिया के दलाल किस्म के लोग
  • गांव-गांव/कस्बे-कस्बे/नगर-नगर में व्यापाराना के अंदाज में मंदिरों को चलानें वाले
  • NGOs को फंड के लिये चलानें वाले
  • NGOs में वेतन के लिये काम करनें वाले
  • ….. आदि आदि

शूद्र वर्ण:

  • इंजीनियर
  • मजदूर
  • किसान
  • राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के प्रचार के लिये सड़क/सोशल साइट्स आदि में पोस्टरबाज
  • ….. आदि आदि

आधुनिक वर्ण-व्यवस्था बहुत अधिक परिवर्तनशील होगी, उदाहरण के लिये-

  • कोई महानुभाव आज किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं तो आज “ब्राम्हण” हैं, किंतु उनकी इच्छा हुयी कि अब चुनाव लड़कर सांसद बना जाये तो उनके सांसद बनते ही जाति बदल कर “क्षत्रिय” हो गयी। कभी चुनाव हार गये और फिर प्रोफेसरी शुरु कर दी तो उनकी जाति फिर “क्षत्रिय” से बदलकर “ब्राम्हण” हो गयी।
  • कोई महानुभाव आज इंजीनियर है तो “शूद्र” जाति का हुआ। किंतु यदि किसी कंपनी में मजूरी न करके किसी कालेज में पढ़ानें लगा तो उसकी जाति “ब्राम्हण” हो गयी। जिस दिन कालेज प्रबंधन नें कालेज में पढ़ानें की नौकरी से निकाल दिया और उसनें फिर से किसी कंपनी में मजूरी करनी शुृरू की तो उसकी जाति “शूद्र” हो गयी।

आप अपनीं कल्पना शक्ति से ऐसे ही हजारों उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं।

“आधार-कार्ड” जैसा एक “वर्ण-कार्ड” होना चाहिये जिसका कि मुख्य डाटाबेस से सीधा आनलाइन संबंध हो और बहुत ही उच्च क्षमता व गुणवत्ता के साफ्टवेयर्स और आनलाइन डाटाबेस आदि होनें चाहिये, जिससे कि मनुष्य के व्यवसाय के बदलते ही तुरत डाटाबेस में उसकी जाति अपडेट हो जाये।

“वर्ण-कार्ड” सबसे जरूरी चीज होगी। हजारों साल पहले लोग पूरा जीवन एक ही गांव या नगर में ही परंपरा में कई पुश्तों तक रह जाते थे। किंतु आज कौन कहां चला जाये और किस व्यवसाय को अपना ले, इसका कोई अनुमान नहीं किया जा सकता है …. इसलिये “वर्ण-कार्ड” बहुत जरूरी होगा ताकि “जाति” को व्यवसाय बदलते ही तुरंत अपडेट कर दिया जाये ताकि कोई लोगों को अपनीं जाति गलत बताकर धोखा न दे पाये, आदि आदि।

यदि आपनें सच में ही यह लेख सच्चे मन से पढ़ा है और अंदर से सामाजिक-बेईमान और स्वार्थी नहीं हैं। तो इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि “जाति-व्यवस्था” एक वाहियात बात है भले ही यह कर्म पर ही आधारित क्यों न हो।

कोशिश कीजिये कि भारत को और भारतीय समाज को जाति से बिलकुल ही मुक्त कीजिये। और इस दिशा में एक छोटा सा कदम भी आप तब ही चल सकते हैं जबकि आप स्वयं में सच्चे मन से इमानदार हों।  इस दिशा में एक कदम चलनें के लिये आपको तर्कों की नहीं सच्चे मन की भावना को यथार्थ धरातल में जीकर प्रमाणित होनें की जरूरत है।

हिंदू धर्म में बहुत ही सुंदर तत्व हैं किंतु जाति जैसी आधारभूत घिनौनी, हिंसक व सामाजिक गुलामी जैसी सड़ांध के कारण सबकुछ आधारहीन हो जाता है।

मैं तो यही कहूंगा कि आईये सबसे पहले भारत को जाति मुक्त देश व समाज बनायें। इतना होते ही भारत में भ्रष्टाचार नगण्य के स्तर में पहुंच जायेगा। भारत सच में ही विश्व-गुरू बननें की क्षमता व योग्यता रखता होगा।

—-
विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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