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जातिवाद सबसे घिनौना/हिंसक फासिज्म और सामाजिक-भ्रष्टाचार को खतम करनें की दिशा में प्रस्तावित सामाजिकता के आधारभूत-रचनात्मक बिंदु

विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
“सामाजिक यायावर”

  • जातिवाद सबसे घिनौना रेसिज्म है
  • जातिवाद सबसे हिंसक सामाजिक-फासिज्म है
  • जातिवाद ही भारत में करप्शन का जनक है
  • मनुष्य को मर्द और औरत की जाति के रूप में देखना भी एक किस्म का जातिवाद है
  • समाज और आदमी को करप्ट बनाया है “जातिवाद” नें।

भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनानें या लागू करनें से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलानें से करप्शन नहीं दूर होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज और समाज का आदमी करप्ट है।

आरक्षण का विरोध तो आरक्षण लागू होनें के पहले दिन से हुआ है, वह भी केवल इसलिये कि शूद्र समकक्ष क्यों खड़ा हो और सामाजिक व राजनैतिक संसाधन व ताकत शूद्र के साथ क्यों साझा हो। इसको योग्यता व अयोग्यता से जोड़ा जाना बहुत ही सतही तर्क है।

दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक माननें वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील माननें वाले अधिसंख्य सवर्ण लोगों का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिये घृणा का भाव रखते हैं क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करनें लगा है और सवर्णों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करना लगा है।

अब मुश्किल तो यह है कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है और “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” पर आधारित है। (मुझ जैसे गवांर-जाहिल की यह पंक्ति समझनें के लिये कुछ मेहनत लगेगी)

हजारों सालों तक कुचला है जिन्हें और उसी कुचले जानें के परिणाम स्वरूप आज संसाधन और मजे ले रहे हैं। जिनकी मेहनत का हजारों साल माल खाया है वह भी पूरी शिद्दत के साथ पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार स्थापित करके थोड़ी सी अंदर की इमानदारी और प्रेम उनके साथ भी साझा करनें की मानवीयता दिखा दीजिये।  या सारी परिभाषायें, सारा दर्शन, सारा ज्ञान, सारी ईमानदारी, सारी महानता व सारी मानवीयता केवल आपके खुद के स्वार्थ व अहंकार तक ही सीमित है।

जातिवाद के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीनें के मौलिक अधिकार भी नहीं थे।

जो लोग योग्यता या अयोग्यता का तर्क देते हैं उनकी सोच शायद अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थ व भोगनें की लिप्सा में यह भूल जाती है कि हजारों वर्षौ के जातिवाद नें भारतीय समाज की करोड़ों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।  प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या कैसे की इस बात को समझनें के लिये नीचें की लाइनों को खुले मन से समझनें की आवश्यकता है।

जातिवाद नें जन्म के आधार पर ही बचपन से ही आदमी की योग्यता व सामाजिक चरित्र तय कर दिया। –

  • ब्राम्हण का पुत्र जो कि मूढ़ बुद्धि का हो तब भी उसे विद्वान माना गया और उसको आजीवन सिर्फ कुछ पोथियों को उल्टा-पुल्टा तरीके से बांच देना है। घोर मूढ़ता को भी महान विद्वता साबित करनें के लिये पौराणिक कथायें बना दीं गयीं। भरपूर सामाजिक षणयंत्रों के साथ मूढ़ता को महान विद्वता साबित करनें का अमानवीय कुचक्र।
  • क्षत्रिय का पुत्र बहुत कायर होते हुये भी, महान बहादुर के रूप में जन्मजात मान लिया गया…. आदि आदि।
  • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुये भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा जन्मजात ही मान लिया गया।
  • शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के गुलाम के रूप में जबरन स्थापित किया गया।

* देश में यदि पौराणिक कथाओं आदि के कथित दैवीय ज्ञान की बात न की जाये तो भारतीय समाज ज्ञान के मामलें में, शिक्षा के मामलें में कहां खड़ा हुआ … इसको समझनें के लिये किसी कुतर्क की बजाय इमानदार मन की जरूरत है। तो यह रहा हजारों वर्षों के ब्राम्हणों के परंपरागत ज्ञान व योग्यता में दावेदारी का परिणाम।

* क्षत्रियों के पुरुषार्थ की वास्तविकता समझनें के लिये चारणों या भाटों के गीतों को महत्व देनें की बजाय यदि सैकड़ों वर्षों की लगातार स्थापित रही राजनैतिक गुलामी को सबूत के तौर पर देखा जाये तो वास्तविकता और यथार्थ  को समझनें के लिये किसी कुतर्क की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

* वैश्यों के व्यापाराना व प्रबंधन की योग्यता, वह भी तब जबकि शूद्र रूपी बेगार गुलाम मौजूद थे खून जलाकर उत्पादन करनें के लिये, को समझनें के लिये किसी छोटे से भी शोध की जरूरत नहीं है।

बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापाराना-प्रबंधन की दावेदारी की हो …. भारतीय समाज के जातिवाद नें लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी बेशर्मी और सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ की है।

  • सोचिये कि यदि शूद्रों को अपनी प्रतिभा को दिखानें का अवसर मिला होता तो बहुतेरे दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज नें दिये होते।
  • सोचिये कि यदि जातियां न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राम्हण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसनें पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
  • सोचिये कि यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होनें वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
  • ऐसे ही सैकड़ों-हजारों बातें सोचीं जा सकतीं हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जातिवाद नें कैसे प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या की वह भी लगातार हजारों वर्षों तक वह भी पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ।

भारत में जातिवाद के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, बहुत ही सीमित दायरे में तुलनात्मक रूप से जो जातियों की सीमितता में बेहतर निकल गया उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही घटिया तरीका आजतक लागू है।

भारतीय संविधान में यदि आरक्षण की व्यवस्था न दी गयी होती तो अभी तक देश की अधिसंख्य जनता अछूत मानी जाती होती, अपनें गलें में थूंकदान और कमर में झाड़ू लटकाये घूम रही होती ताकि उसके पदचिंहों से और थूक से किसी ब्राम्हण का जन्मजात दैवीय रूप से प्राप्त ज्ञान भष्म न हो जाये।

सवर्णों नें आजतक कभी शूद्रों को अपनें समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जातिवाद से ऊपर उठकर देखनें की चेष्टा भी नहीं किये। जातिवाद का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करनें के लिये और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। 

भारत में योग्यता का मापदंड कौन किस स्तर की सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है, जैसे वाहियात और बेफिजूल कसौटी के आधार पर किया जाता है।

जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जातिवाद” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाये हुये झूठों में जीते हैं और “जातिवाद” जैसी सामाजिक विभीषिका को अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।

ज्यों ज्यों शूद्र जातियां प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों सवर्णों को समाज से “जातिवाद” खतम होते दिख रहा है, इसलिये “आरक्षण” व “जातिवादी राजनीति” का विरोध किया जाता है।

दूर से देखनें में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जातिवाद” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिये जाते हैं, किंतु यथार्थ में तो यह विरोध स्व-केंद्रित स्वार्थों का ही है।

वास्तव में बिना सामाजिक इमानदारी के “जातिवाद” का पत्ता भी नहीं हिलनें वाला। सवर्ण जातियों की ओर से जब भी जातिवाद के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- आरक्षण और जातिवादी राजनीति।

यदि सवर्ण सच में ही सामाजिक इमानदार होता और जातिवाद को खतम करनें के लिये थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करता तो जातिवाद कब का खतम हो गया होता।

सवर्णों को कुछ नहीं करना था केवल अपनें अंदर से जातिवाद की भावना खतम करनीं थी, केवल इतना ही करना था और कुछ नहीं करना था। जातिवाद की भावना शब्दों से तो खतम होती नहीं, इसके लिये जीवन में जीवंत रूप में इस भावना को जीकर प्रमाणित करना पड़ता। 

यह भावना प्रमाणित होती अंतर्वर्णीय विवाहों को प्रोत्साहित करनें से और सहजता के साथ सामाजिक मान्यता देनें से। आजादी के 65 वर्षों में अंतर्वर्णीय विवाहों का प्रतिशत धीरे धीरे बढ़कर 100% तक हो जाना चाहिये था, किंतु आज भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं सामाजिक घृणा के स्तर पर, शायद घृणा के और भी बढ़े हुये स्तर पर क्योंकि अब यह घृणा दोनों तरफ से हो गयी है पहले केवल सवर्णों से शूद्रों की ओर थी और शूद्र पौराणिक कथाओं को सच मानकर खुद को ब्रम्हा जी के मैल की पैदाइश की नियति व पापों का दंड भोगना मानकर जी रहे थे।

किंतु अंग्रेजों के आनें से काफी कुछ भ्रम टूटा और संवैधानिक आरक्षण पानें के बाद जब सवर्णों के द्वारा भोगे जा रहे हजारों वर्षों के सामाजिक आरक्षण की ही तरह संवैधानिक आरक्षण को पाकर खुद को कुछ कुछ आदमी समझना शुरु किया तो हजारों सालों के शोषण की प्रतिक्रिया बननीं शुरु हुयी।

आजादी के बाद सवर्णों नें शूद्रों को रोकनें के हथकंडों की बजाय यदि जातिवाद जैसी घिनौनी कुरीति को खतम करनें के बारे में गंभिरता से सोचा होता और सवर्ण-शूद्र को मिश्रित कर दिया होता तो आज देश की हालात ही कुछ और होती। तब हमें न तो गांधी, नेहरू व बाबासाहेब को गरियानें की जरूरत होती, न हीं देश में भ्रष्टाचार होता और न ही लोकतंत्र खतरे में होता।

किंतु शायद ब्राम्हणों का दैवीय ज्ञान, क्षत्रियों का पराक्रम, वैश्यों की प्रबंधन कुशलता व योग्यता इतनी छोटी सी बात समझनें की भी योग्यता व दृष्टि नहीं रख पायी और देश इतनें अधिक खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

यदि अंतर्वर्णीय विवाहों के द्वारा सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित कर दिया गया होता तो आज किसी भी प्रकार के आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती और भारत की राजनीति व लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा भी नहीं भटकती।

कुछ अपवादों को सामनें रखकर हम लोग पूरी निर्लज्जता के साथ जातिगत-व्यवस्था को उचित साबित करना शुरु कर देते हैं।  मैं कहता हूं कि कभी तो हम सच में समाज के प्रति इमानदार हो जायें, कभी तो अपनें अंदर के चोर को खतम करें, कुछ थोड़ा सा ही सही लेकिन देश, समाज व अगली पीढ़ियों के लिये दूरदर्शी कदम तो उठा लें।

जातिवाद का सिर्फ और सिर्फ एक ही समाधान है और वह है कि प्रतिवर्ष होनें वालीं लाखों शादियों में से अधिकतर शादिया सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित करतीं हुयीं हों।  समान आर्थिक/सामाजिक स्तर के सवर्णों और शूद्रों के विवाहों से इस तरह की रचानात्मक शुरुआत की जा सकती है। आरक्षण से शूद्रों का आर्थिक व सामाजिक स्तर तो बढ़ा ही है, सो ऐसी सामाजिक शुरुआत कुछ मुश्किल नहीं।

जातिवाद खतम करनें के लिये सिर्फ सवर्णों को इच्छाशक्ति का परिचय देना है और अपनें अंदर के घृणा भाव व कथित जातिवादी श्रेष्ठता के छुपे हुये अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालना है …. इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है…. और इसके अलावे कोई समाधान भी नहीं है।  

जातिवाद का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ इमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है।  यह समाधान ही नये समाज, नये देश व नये सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो कि आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर ही होगें।  

(नोट- इस सार्थक व मानवीय सोच वाले लेख को कृपया घृणा, अहंकार, पूर्वाग्रह और स्वार्थ से दूषित न किया जाये ऐसा विनम्र निवेदन है, सादर प्रणाम।)

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विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

Vivek U Glendenning "Nomad"

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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