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काश हम धूर्त, अवसरवादी, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी और कामचोर आदि न होते तो कम से कम आजादी, आजादी के लिये संघर्ष करनें वाले पूर्वजों और गणतंत्र का निरादर और मजाक न उड़ाते होते

सामाजिक यायावर

भारत नें दो प्रकार की गुलामियां झेलीं हैं वह भी लगातार।

पहली हजारों सालों की निरंतर “सामाजिक गुलामी” जो कि जातिवाद जैसी घिनौनी सामाजिक हिंसा, धूर्तता और षणयंत्र आदि से कूट कूट कर भरी हुयी थी।

दूसरी सैकड़ों सालों की निरंतर “राजनैतिक गुलामी”।

जिस समय देश में सड़कें नहीं थीं, संपर्क मार्ग तक नहीं थे, संचार माध्यम नहीं थे, देश की 85% से अधिक जनसंख्या को शिक्षा के अधिकार नहीं थे, बीमारियों के इलाज नहीं थे, लोगों को मौलिक अधिकार तक नहीं थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक नहीं थी …. और भी बहुत कुछ जो कि बहुत ही गंभीर व मौलिक था …. वह नहीं प्राप्त था समाज के अधिसंख्य लोगों को।

उस समय देश के लोगों नें “बाल-विवाह” और “जातिवाद” जैसी कुरीतियों के बारे में सोचा और लड़नें का साहस किया।

हजारों सालों की “सामाजिक गुलामी” और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के विरुद्ध लोगों नें बिना संसाधन के संघर्ष किया और विजय पायी।

पूर्वजों नें “सामाजिक गुलामी” व “राजनैतिक गुलामी” को लगातार झेलते हुये भी “आजादी” और “गणतंत्र” के बारे में सोचा, कल्पना की। केवल सोचा या कल्पना ही नहीं किया बल्कि यथार्थ में उतार कर अपनीं आनें वाली पीढ़ियों के लिये सहेज दिया।

बिना किसी प्रकार की नागरिक-सुविधा के, बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के, बिना संचार-माध्यमों के, बिना किसी शिक्षा आदि के …. हमारे पूर्वजों नें देश को न केवल “राजनैतिक आजादी” दिलायी बल्कि “जातिवाद” के खिलाफ भी संघर्ष किया और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के बावजूद, अशिक्षा के बावजूद, घोर नारकीय जीवन जीवन जीते रहनें के बावजूद देश को “गणतंत्र” दिया।

लाखों, करोड़ों लोगों के निरंतर संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है हमारे देश की आजादी व गणतंत्र।

आइये अब अपना भी मूल्यांकन कर लें कि हमनें क्या किया आजादी के बाद-

हमनें केवल और केवल अपनी लिप्सा, अपनें स्वार्थ, अपनें भोग आदि के लिये देश को मजाक बनाकर रख दिया। हमनें कभी देश के बारे में सोचा ही नहीं, हमनें केवल अपनी महात्वाकांक्षाओं और लिप्साओं के बारे में सोचा।

तंत्र में खराबी हम पैदा करते हैं और गालियां देते हैं पूर्वजों को, कि उन्होनें यह न किया होता तो ऐसा होता या वैसा होता।

हमनें पूर्वजों को गालियां देनें के लिये संगठन बनाये और जो जितना गरिया ले उसको उतना ही बड़ा बुद्धिजीवी मानते हैं और प्रशंसा करते हैं। गांधी को गरियानें के संगठन, बाबा साहेब को गरियानें के संगठन, बुद्ध को गरियानें के संगठन ….. आदि आदि।

हम अपना खुद का स्तर अपनें खुद के स्वार्थ, अपनें परिवार व रिश्तेदारों के स्वार्थ से ऊपर कभी उठा नहीं पाये, लेकिन गांधी, बाबासाहेब, बुद्ध आदि को तबियत से हर बात में गरियानें में ही अपनी बौद्धिकता, अपनी क्रांतिकारिता, अपनी सामाजिक समझ, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और अपना सामाजिक उत्तरदायित्व साबित करते हैं।

आजादी के बाद की हमारी पीढ़ियां इतना अधिक स्वार्थ में लिप्त है, इतना अधिक भोगी हो गई है कि आजादी को और पूर्वजों को केवल इसलिये गरियाती है कि उसको और अधिक भोगनें को क्यों नहीं मिल रहा है। कभी किसी पूर्वज को गरियाना, कभी किसी को।

हम ऐसे ऐसे लोगों को बिना जांचे सत्ता सौंप देते हैं जिसनें भारत को समझा तक नहीं है, जिसनें कभी कोई ठोस सामाजिक काम नहीं किया। हमनें यह समझनें की जहमत तक नहीं उठाते कि जिसको हम अपना जन-प्रतिनिधि बना रहे हैं या सत्ता सौंप रहे हैं उनकी कोई वास्तविक सामाजिक समझ है भी या नहीं।

हम नशे में अपनें जन प्रतिनिधि चुनते हैं और अपनें ऊपर शासन करनें का अधिकार देते हैं। और फिर गालिया देते हैं गणतंत्र को और उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें हमारे लिये त्याग किया जीवन का बलिदान दिया।

हमारे पास इतनी तमीज नहीं कि हम अपना जन-प्रतिनिधि चुन सकें और गालियां देते हैं उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें घोर नारकीय जीवन जीते हुये भी आजादी के बारे में सोचा, गणतंत्र के बारे में सोचा और अपनीं कल्पना को यथार्थ में साकार कर दिया।

यह भारतीय गणतंत्र की ही उदारता व महानता है कि यहां लोकतंत्र को, गणतंत्र को गरियानें वाले लोग जिन्होनें वास्तविकता में समाज के लिये कभी कुछ ठोस किया भी नहीं और केवल संचार माध्यमों और लोकतंत्रिक मूल्यों को गरियानें के कारण खुद को रातोंरात क्रांतोकारी साबित करते हैं उनको लोग अपना जन-प्रतिनिधि चुनते हैं और राजनैतिक सत्ता सौपते हैं।

ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिये हो पाता है क्योंकि हमनें कभी अपनें भोगनें से ऊपर उठकर देश के बारे में नहीं सोचा, हम सब कुछ पका पकाया पाना चाहते हैं। इसलिये हम कुछ कोई पुरुषार्थ किये बिना ही अवसरवादिता से और अधिक भोगना चाहते हैं और देश व समाज की कीमत पर भोगना चाहते हैं और लगातार भोगना चाहते हैं।

हम देश व समाज की कीमत पर, अपनीं आनें वाली पीढ़ियों की कीमत पर भोगना चाहते हैं और पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ देश व समाज का उपहास उड़ाते हुये भोगना चाहते हैं।

“ मैं भी अपनी किशोरावस्था में आजादी व गणतंत्र का मजाक बनाता था और लड्डू व जलेबी व मिठाई आदि का ही दिन मानता था। किंतु समय के साथ साथ मैंनें जितना भारत, भारत के गांवों, भारत के लोगों और लोकतंत्र को समझा, मैनें उतना ही भारत की राजनैतिक आजादी का आदर करना सीखा। उतना ही उन लाखों-करोड़ों पूर्वजों का आदर करना सीखा जिन्होनें अपना जीवन बलिदान किया वह भी आनें वाली पीढ़ियों के लिये ताकि वे कम से कम अपनें ही देश में दूसरों के जूतों के तले तो न कुचले जायें और कुचलनें वाला यदि कोई हो तो अपना ही हो।

मैंने यह भी सोचना शुरु किया कि मैं देश व समाज के लिये क्या कर रहा हूं जबकि कम से कम मेरे पास राजनैतिक स्वतंत्रता तो है, कुछ नहीं तो पब्लिकली गालियां बकनें का अधिकार तो रखता ही हूं। पूर्वजों के पास तो यह भी नहीं था। तो जब वे कुछ न होते हुये भी इतना सोच और कर गये तो मैं इतना सब कुछ भोगते हुये क्या कुछ बहुत थोड़ा सा भी देश व समाज के लिये नहीं कर सकता हूं।

क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता हूं कि मैं पूर्वजों को न गरियायूं, मैं आजादी का मजाक न बनाऊं, मैं गणतंत्र का उपहास न करूं। क्या सच में इतना भोगनें के बावजूद मैं इतना भी आभारी नहीं हो सकता हूं देश के पूर्वजों के लिये।

क्या सच में ही मैं इतना अधिक धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसारवादी आदि हूं …… क्या सच में ही मैं ऐसा ही हूं … “

—-
विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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