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अस्वीकरण (डिस्क्लेमर)

लेख में विचार लेखक के अपने विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया में प्रकाशित होने का तात्पर्य लेखक के विचारों से ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया या संपादक या टीम आदि की सहमत होना नहीं हैं। - संपादकीय टीम

13 Comments

  1. sambhunath
    September 3, 2011 @ 23:11

    In this “Kali Yuga” it is too difficut to access the hearts of others.

    Reply

  2. Krystal Jordan
    May 29, 2010 @ 12:01

    You’ve done it once again. Amazing article.

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  3. रंगनाथ सिंह
    September 7, 2009 @ 07:31

    शाह आलम ने आप के ब्लाग का लिंक भेजा। ब्लाग और इसके सारोकार अच्छे लगे।

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  4. संदीप
    September 6, 2009 @ 21:47

    प्रिय विवेक

    काश अगर तुम रमन मैग्सेसे के बारे में लिखते कि वह क्या था वह कैसा शासक था, उसने कितने निर्दोष लोगों की हत्या की, कितना बड़ा तानाशाह था। वह कितना बड़ा लोकतंत्र का हत्यारा था, गरीबों को जानवर की तरह क्यों समझता था और मजदूरों को देश का कोढ़ क्यों कहता था?
    यह भी लिखो कि वे लोग जो शांति की मूर्ति बने इसका पुरस्कार ग्रहण करते हैं वे कतने बड़े रंगे सियार हैं। वे कितना बड़ा जनता से छल कर रहे हैं।
    लिखो की इसे बढ़ाने में दुनिया के तानाशाह कैसे मदद कर रहे हैं। और यह भी लिखो कि दुनिया को एक बार और तानाशाही के आदिम युग में घसीटने का यह पुरस्कार एक षणयंत्र है। जनता को इससे सतर्क होने की जरूरत है।
    असल में मैग्सेसे पुरस्कार तानाशाहों को महिमामंडित करने का एक माध्यम बन चुका है वैसे ही जैसे अगर तुम्हें बुश पुरस्कार या हिटलर पुरस्कार दिया जाए तो कैसा लगेगा।

    इसे लिखो तो कुछ बात बनेगी। लोगों को पता चलेगा कि रमन मैग्सेसे एक तानाशाह था तो उनके सामने ये ढोंगी खुद बेनकाब हो जाएंगे। इन्हें गलिया कर तुम अपना पक्ष कमजोर कर रहे हो। वे तुम्हें व्यक्तिगत चरित्र हनन में घसील लेंगे। और जानते हो इसमें वे पारंगत हैं।
    इसलिए हे प्रभु तुम्हें तरीका बदलकर उसकी वैचारिक तोड़ पेश करनी होगी। इस तरह तुम केवल एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा कर रहे हो। और जब तुम पुरस्कार की राजनीति और उसके बारे में लिखोगे तो इस पूरे तंत्र पर हमला होगा। और यही सबसे बड़ा हमला है। लोगों को यही सही दिशा बताना है।
    सदिच्छा के साथ
    संदीप राउजी

    Reply

    • indu
      September 3, 2011 @ 22:40

      great sandeep g

      Reply

  5. पी. के. सिद्धार्थ
    August 26, 2009 @ 09:25

    प्रिय विवेक,

    मैंने आपका व्यग्य लेख पढ़ा. रोचक और धारदार लगा. हिंदी में व्यंग्य विधा एक उपेक्षित विधा है. आप और भी विषयोंपर जरूर लिखें, जैसे सामजिक या राजनैतिक व्यंग्य. यह हिंदी को एवं समाज को एक योगदान होगा.

    सस्नेह,

    पी. के. सिद्धार्थ

    Reply

  6. Swapan Mahato
    August 24, 2009 @ 04:00

    Dude, try it in English if you want to reach a larger audience. Mother tongue is fine for sentimental reasons but English is a better vehicle for the real world outside Bihar.

    Reply

  7. umesh rashmi rohatgi
    August 23, 2009 @ 20:13

    vivek
    tumne bahut accha lekh liha hai tum shrey ke patra ho. par apna smay yadi rachnatamak kamo me lagao to samay ka jayda sadupyog hoga.ha santo ke bisay me bhi lekh likho par kitne admi padejnge usey mai nahi kah sakta pr man ke udgar nikal jayange.
    with love
    umesh rashmi rohatgi

    Reply

  8. Ananthanarayanan
    August 23, 2009 @ 17:06

    Thank you Vivek, Google helped me in translating your web page. The comments on the article follow in a couple of hours.

    Reply

  9. Alex - Boon Chocolates
    August 23, 2009 @ 14:41

    I wish I can read hindi.

    It is a beautiful language….

    It’s like a language with a roof on the top.

    thanks.

    regards
    Alex

    Reply

  10. Shishir Kant Singh
    August 23, 2009 @ 13:59

    Sir,
    aapne toh un sabhi “madhadisho” per comment kiya hai jo sirf aapne baarien me sochte hain..
    sir aapko aaj-kal ke “santo”(mahatma) logo per bhi comment karna chahiye jo crore rupiya rakhe hue hain aur har city me unke farmhouse & haveli hain..lekin mahtma kahne wale sirf AC me rahte hain aur aam janta ko pagal banate hain..

    Reply

  11. Einstein Kunwar
    August 21, 2009 @ 23:05

    आपने बिलकुल सत्य कहा है इन टोटका गुरुओं के बारे में|
    और जाति तो ब्राह्मण होनी ही चाहिए| प्रथम शर्त- इसे मैं टोटका गुरुओं के
    लिए विशेष आरक्षण कहता हूँ| जो गुप्त है लेकिन सौ प्रतिशत पालन किया जाता है|
    मुझे विश्वास है इस आरक्षण का विरोध कभी नहीं होगा क्यों कि इसे उठाने वाले विरले होते हैं जो वाकई इसके प्रति गंभीर हो| आपको आपके बेहतरीन आलेख के लिए …आभार …..

    Reply

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